नियमित सरकारी कर्मचारी नहीं होने का तर्क खारिज, तीन महीने के भीतर निर्णय लेने का निर्देश

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने साफ किया है कि केवल नियमित सरकारी कर्मचारी नहीं होने के आधार पर किसी महिला गेस्ट लेक्चरर को मातृत्व अवकाश की अवधि का वेतन देने से इनकार नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961 में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, जो इस लाभ को केवल नियमित महिला कर्मचारियों तक सीमित करता हो।

जस्टिस बिभु दत्त गुरु की सिंगल बेंच ने 27 अक्टूबर को दिए फैसले में राज्य के उच्च शिक्षा विभाग और संबंधित अधिकारियों को याचिकाकर्ता के बकाया वेतन के दावे पर नियमानुसार निर्णय लेने का निर्देश दिया है।

मातृत्व अवकाश के वेतन के लिए लगाई थी गुहार

याचिकाकर्ता पुष्पा जायसवाल कोंडागांव के शासकीय गुंडाधुर पीजी कॉलेज में राजनीति विज्ञान की गेस्ट लेक्चरर हैं। उन्होंने 16 अगस्त 2024 से कॉलेज में काम करना शुरू किया था। मातृत्व अवकाश के बाद वह 19 अगस्त 2026 को दोबारा ड्यूटी पर लौटीं।

अवकाश की अवधि का वेतन पाने के लिए उन्होंने 29 मई और 5 अगस्त 2026 को संबंधित अधिकारियों को आवेदन दिया था। लेकिन उनके आवेदनों पर कार्रवाई नहीं हुई। इसके बाद उन्होंने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

सरकार ने नियमित कर्मचारी नहीं होने का दिया तर्क

याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961 की धारा 5 के तहत उन्हें मातृत्व अवकाश के दौरान वेतन और दूसरे निर्धारित लाभ पाने का अधिकार है। इसके बावजूद अधिकारियों ने भुगतान नहीं किया।

वहीं, राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि याचिकाकर्ता नियमित सरकारी कर्मचारी नहीं हैं, इसलिए वह इस अधिनियम के तहत मातृत्व लाभ का दावा नहीं कर सकतीं।

हाईकोर्ट ने सरकार की इस दलील को स्वीकार नहीं किया।

मातृत्व लाभ केवल नियमित कर्मचारियों तक सीमित नहीं

कोर्ट ने कहा कि मातृत्व लाभ अधिनियम में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, जो नियमित महिला कर्मचारियों को ही इस लाभ का हकदार मानता हो और कैजुअल, दैनिक वेतन या गेस्ट आधार पर काम करने वाली महिलाओं को इससे बाहर रखता हो।

कोर्ट ने यह भी कहा कि गर्भावस्था के अंतिम चरण में किसी महिला से कठिन श्रम कराना उसके स्वास्थ्य और गर्भस्थ शिशु के लिए नुकसानदेह हो सकता है। मातृत्व अवकाश देने के पीछे कानून का उद्देश्य ही महिला को इस तरह के नुकसान से बचाना है।

सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का भी दिया हवाला

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के डॉ. कविता यादव बनाम सचिव, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय मामले में 2024 में दिए गए फैसले का हवाला दिया। उस फैसले में कहा गया था कि कानून की धारा 5(2) की शर्तें पूरी होने पर मातृत्व लाभ का अधिकार बनता है और रोजगार की अवधि समाप्त होने के बाद भी यह लाभ लागू हो सकता है।

इसके अलावा, सुप्रीम कोर्ट के दिल्ली नगर निगम बनाम महिला कर्मचारी (मस्टर रोल) मामले का भी उल्लेख किया गया, जिसमें दैनिक वेतन पर काम करने वाली महिला कर्मचारियों को मातृत्व लाभ देने की व्यवस्था को लागू माना गया था।

हाईकोर्ट ने यह भी गौर किया कि राज्य सरकार ने इस बात से इनकार नहीं किया कि याचिकाकर्ता नियमित लेक्चरर के समान काम करती हैं। ऐसे में केवल गेस्ट लेक्चरर होने के आधार पर उन्हें मातृत्व लाभ से वंचित करना उचित नहीं है।

तीन महीने के भीतर निर्णय लेने का निर्देश

हाईकोर्ट ने स्पष्ट कहा कि मातृत्व अवकाश की अवधि का वेतन इस आधार पर नहीं रोका जा सकता कि संबंधित महिला गेस्ट लेक्चरर के रूप में काम कर रही थी। कोर्ट के मुताबिक, जब मातृत्व अवकाश स्वीकृत किया गया था, तो संबंधित अधिकारियों की जिम्मेदारी थी कि वे उस अवधि का वेतन जारी करें।

कोर्ट ने अधिकारियों को याचिकाकर्ता के बकाया वेतन के दावे पर नियमों और दिशा-निर्देशों के अनुसार फैसला लेने तथा उचित आदेश पारित करने को कहा है। आदेश की प्रति मिलने के तीन महीने के भीतर निर्णय लेने को प्राथमिकता देने का निर्देश दिया गया है।

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