सेवा से निलंबन की मांग, वर्तमान जांच अधिकारियों पर भी उठाए सवाल
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी रतनलाल डांगी के खिलाफ लगाए गए यौन उत्पीड़न के आरोपों की जांच को लेकर पीड़ित महिला की ओर से रिट याचिका दायर की गई है। याचिका में मांग की गई है कि मामले की जांच किसी आईपीएस अधिकारी के बजाय वरिष्ठ महिला आईएएस अधिकारी से कराई जाए, ताकि जांच निष्पक्ष और स्वतंत्र रूप से हो सके।
अधिवक्ता अभिषेक पांडेय के माध्यम से दायर याचिका में कहा गया है कि शिकायत की जांच के लिए तत्कालीन आईजी आनंद छाबड़ा और तत्कालीन डीआईजी मिलना कुर्रे को जांच अधिकारी नियुक्त किया गया, जबकि दोनों अधिकारी या तो समान रैंक के हैं या शिकायत में नामित अधिकारी से कनिष्ठ हैं। ऐसे में निष्पक्ष जांच की संभावना प्रभावित हो सकती है।
दस्तावेजी और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य सौंपने का दावा
याचिका में कहा गया है कि शिकायतकर्ता ने अक्टूबर 2025 में पुलिस महानिदेशक को दस्तावेजी और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों के साथ शिकायत सौंपी थी। इसके बावजूद अब तक अपेक्षित कार्रवाई नहीं हुई।
याचिकाकर्ता ने वर्तमान जांच अधिकारियों को हटाकर स्वतंत्र जांच कराने, शिकायत में लगाए गए आरोपों की निष्पक्ष पड़ताल करने और नियमानुसार कार्रवाई करने की मांग की है।
संपत्तियों की भी जांच की मांग
याचिका में यह भी अनुरोध किया गया है कि राजस्थान और छत्तीसगढ़ में आईपीएस अधिकारी की संपत्तियों की जांच कराई जाए। साथ ही जांच पूरी होने के बाद नियमों के अनुसार कार्रवाई करते हुए उन्हें सेवा से बर्खास्त करने की भी मांग की गई है।
जांच अधिकारियों की नियुक्ति पर आपत्ति
याचिकाकर्ता ने तत्कालीन आईजी आनंद छाबड़ा की नियुक्ति पर आपत्ति जताते हुए कहा है कि वे शिकायत में नामित अधिकारी के समान रैंक के हैं, इसलिए उनके द्वारा जांच कराना उचित नहीं है।
याचिका में यह भी उल्लेख किया गया है कि महादेव बेटिंग ऐप प्रकरण से संबंधित एक आपराधिक मामला आनंद छाबड़ा के खिलाफ लंबित है। इसी आधार पर शिकायतकर्ता ने उनसे जांच नहीं कराए जाने का आग्रह किया है।
इसी प्रकार तत्कालीन डीआईजी मिलना कुर्रे के संबंध में भी कहा गया है कि वे रैंक में शिकायत में नामित अधिकारी से कनिष्ठ हैं, इसलिए उनके द्वारा जांच कराना भी उचित नहीं होगा।
निलंबन नहीं होने पर भी उठाए सवाल
याचिका में यह भी कहा गया है कि इतने गंभीर आरोपों के बावजूद राज्य सरकार ने अब तक संबंधित आईपीएस अधिकारी को निलंबित नहीं किया है। शिकायतकर्ता का तर्क है कि इससे जांच की निष्पक्षता प्रभावित होने की आशंका है।
फिलहाल यह मामला छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में विचाराधीन है और याचिका पर सुनवाई होना बाकी है।













