डीएनए रिपोर्ट को यूं ही खारिज नहीं किया जा सकता: हाईकोर्ट
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने पॉक्सो (POCSO) अधिनियम से जुड़े एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि केवल इस आधार पर डीएनए रिपोर्ट को खारिज नहीं किया जा सकता कि जैविक नमूनों की ‘चेन ऑफ कस्टडी’ में कथित रूप से कमी थी। जब तक यह साबित न हो कि नमूनों से छेड़छाड़, अदला-बदली या संदूषण हुआ है, तब तक वैज्ञानिक डीएनए रिपोर्ट को अविश्वसनीय नहीं माना जा सकता।
मुख्य न्यायाधीश जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने नाबालिग साली से दुष्कर्म के मामले में दोषी की आपराधिक अपील खारिज करते हुए पॉक्सो एक्ट के तहत सुनाई गई 20 वर्ष के कठोर कारावास की सजा को बरकरार रखा।
14 वर्षीय साली को बनाया था शिकार
अभियोजन के अनुसार, 28 मार्च 2020 को डौंडी थाने में पीड़िता के पिता ने शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायत में बताया गया कि उनकी 14 वर्षीय बेटी, जो कक्षा नौवीं की छात्रा थी, को उसके जीजा ने बहलाकर उसके साथ जबरन शारीरिक संबंध बनाए। इस घटना के कारण वह गर्भवती हो गई।
जांच पूरी होने के बाद पुलिस ने चालान पेश किया। बालोद स्थित फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट ने 12 दिसंबर 2023 को आरोपी को पॉक्सो एक्ट की धारा 6 के तहत दोषी ठहराते हुए 20 वर्ष के कठोर कारावास और ₹2,000 जुर्माने की सजा सुनाई थी। जुर्माना नहीं भरने पर एक वर्ष का अतिरिक्त कठोर कारावास निर्धारित किया गया था। इसी फैसले को आरोपी ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
स्कूल रिकॉर्ड को माना सबसे विश्वसनीय
सुनवाई के दौरान आरोपी ने दावा किया कि पीड़िता की उम्र को लेकर विरोधाभास हैं और स्कूल में दर्ज जन्मतिथि विधिसम्मत तरीके से साबित नहीं हुई है। हालांकि हाईकोर्ट ने कहा कि मौखिक बयानों की तुलना में दस्तावेजी साक्ष्य अधिक विश्वसनीय होते हैं।
खंडपीठ ने सुप्रीम कोर्ट के जर्नैल सिंह बनाम हरियाणा राज्य फैसले का हवाला देते हुए कहा कि स्कूल के प्रवेश एवं त्यागपत्र रजिस्टर में दर्ज जन्मतिथि को प्राथमिकता दी जाएगी। रिकॉर्ड में पीड़िता की जन्मतिथि 23 मई 2005 दर्ज थी और उसके पिता ने भी कभी इसे संशोधित कराने का प्रयास नहीं किया। इस आधार पर अदालत ने माना कि घटना के समय पीड़िता 18 वर्ष से कम आयु की थी और पॉक्सो कानून के तहत ‘बालिका’ की श्रेणी में आती है।
डीएनए रिपोर्ट पर उठाई गई आपत्ति खारिज
आरोपी ने यह भी तर्क दिया कि जैविक नमूनों की सुरक्षित अभिरक्षा (चेन ऑफ कस्टडी) सिद्ध नहीं हुई, इसलिए डीएनए रिपोर्ट पर भरोसा नहीं किया जा सकता। लेकिन हाईकोर्ट ने कहा कि केवल सामान्य आरोप पर्याप्त नहीं हैं। यदि नमूनों से छेड़छाड़ या संदूषण का कोई ठोस प्रमाण नहीं है, तो वैज्ञानिक रिपोर्ट को अस्वीकार करने का कोई आधार नहीं बनता।
अदालत ने पाया कि डीएनए जांच में नवजात के मातृत्व संबंधी आनुवंशिक चिन्ह पीड़िता से और पितृत्व संबंधी चिन्ह आरोपी से मेल खाते हैं। जांच अधिकारी ने भी बताया कि रक्त नमूने विधिवत एकत्र कर राज्य फॉरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला, रायपुर भेजे गए थे।
पितृत्व साबित होने पर आरोपी पर बढ़ा जवाब देने का दायित्व
हाईकोर्ट ने कहा कि जब वैज्ञानिक रूप से यह सिद्ध हो गया कि पीड़िता से जन्मे बच्चे का जैविक पिता आरोपी ही है, तब यह दायित्व आरोपी पर था कि वह इसका कोई विश्वसनीय स्पष्टीकरण देता। लेकिन उसने केवल आरोपों से इनकार किया और कोई ठोस जवाब नहीं दिया।
छोटी विसंगतियों से नहीं टूटता अभियोजन का मामला
अदालत ने यह भी कहा कि यौन अपराधों के मामलों में पीड़िता के बयान में मामूली विरोधाभास स्वाभाविक हो सकते हैं। ऐसे मामलों में न्यायालयों को संवेदनशीलता के साथ साक्ष्यों का मूल्यांकन करना चाहिए। यदि मेडिकल और वैज्ञानिक साक्ष्य पीड़िता के बयान की पुष्टि करते हैं, तो केवल छोटी विसंगतियों के आधार पर अभियोजन का पूरा मामला खारिज नहीं किया जा सकता।
खंडपीठ ने ट्रायल कोर्ट के फैसले में किसी प्रकार की कानूनी त्रुटि या अनियमितता नहीं पाई और आरोपी की अपील खारिज करते हुए उसकी दोषसिद्धि और सजा को बरकरार रखा। साथ ही, सजा स्थगन के लिए दायर आवेदन भी निरर्थक मानते हुए समाप्त कर दिया।













