प्रीमियम काटने के बाद भी पोर्टल पर नहीं चढ़ी किसानों की जानकारी, बीमा कंपनी ने करीब 10 महीने तक रकम अपने पास रखी
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने फसल बीमा का लाभ नहीं मिलने से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में किसानों के पक्ष में फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि बैंक किसानों के खाते से फसल बीमा का प्रीमियम काटकर बीमा कंपनी को भेज देता है, लेकिन आवश्यक जानकारी पोर्टल पर अपलोड नहीं करता, तो बैंक की लापरवाही मानी जाएगी। वहीं, बीमा कंपनी भी प्रीमियम की राशि लंबे समय तक अपने पास रखकर जिम्मेदारी से बच नहीं सकती।
हाईकोर्ट ने माना कि किसानों को संस्थागत और विभागीय लापरवाही का खामियाजा नहीं भुगतना चाहिए। अदालत ने कृषि बीमा कंपनी ऑफ इंडिया लिमिटेड की तीन याचिकाओं को खारिज करते हुए निचली उपभोक्ता अदालतों के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।
तीन किसानों को नहीं मिल सका फसल बीमा का लाभ
मामला राजनांदगांव जिले के किसान नरेंद्र कुमार वर्मा, संतुराम वर्मा और उमाशंकर वर्मा से जुड़ा है। तीनों किसानों ने पंजाब नेशनल बैंक से किसान क्रेडिट कार्ड के तहत कृषि ऋण लिया था। प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत बैंक ने उनके खातों से बीमा प्रीमियम की राशि काटकर बीमा कंपनी को भेज दी थी।
इसके बावजूद किसानों से संबंधित जरूरी विवरण नेशनल क्रॉप इंश्योरेंस पोर्टल पर समय पर अपलोड नहीं किया गया। परिणामस्वरूप किसान फसल बीमा योजना के तहत मिलने वाले लाभ से वंचित रह गए।
प्रीमियम मिलने के बाद भी करीब 10 महीने तक राशि रखी
जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की एकलपीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि किसानों की जानकारी समय पर उपलब्ध नहीं कराने में बैंक की लापरवाही थी। लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि बीमा कंपनी प्रीमियम की राशि को लंबे समय तक अपने पास रखे।
अदालत के अनुसार, बीमा कंपनी ने करीब 10 महीने तक प्रीमियम की राशि अपने पास रखी। यदि किसानों का बीमा प्रभावी नहीं हो सका था, तो कंपनी को उचित अवधि में राशि वापस करनी चाहिए थी। कोर्ट ने इसके लिए तीन सप्ताह के भीतर प्रीमियम वापस करने की बात कही।
उपभोक्ता आयोग के फैसले को हाईकोर्ट की मंजूरी
इस मामले में जिला उपभोक्ता आयोग ने शुरुआत में बैंक को जिम्मेदार ठहराया था। इसके बाद राज्य उपभोक्ता आयोग ने बीमा कंपनी को भी सेवा में कमी का दोषी माना। हाईकोर्ट ने दोनों संस्थानों की भूमिका और जिम्मेदारी को उचित माना।
अनुच्छेद 227 के तहत सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि अधीनस्थ अदालतों के आदेश में ऐसी कोई गंभीर कानूनी त्रुटि नहीं है, जिसके आधार पर उसमें हस्तक्षेप किया जाए। अदालत ने साक्ष्यों का दोबारा मूल्यांकन करने के बजाय मामले की कानूनी स्थिति की समीक्षा की और बीमा कंपनी की तीनों याचिकाएं खारिज कर दीं।
इस फैसले से यह स्पष्ट संदेश गया है कि फसल बीमा योजना में बैंक और बीमा कंपनी की जिम्मेदारियों के बीच तालमेल में हुई लापरवाही का भार सीधे किसानों पर नहीं डाला जा सकता।













