21 साल पहले जगदलपुर और रायपुर स्थित ठिकानों से 57.84 लाख रुपये की संपत्ति मिलने का आरोप 

बिलासपुर। आय से अधिक संपत्ति के मामले में आरोपों का सामना कर रहे जगदलपुर में पदस्थ सहायक पशु शल्यज्ञ डॉ. नारायण प्रसाद पांडेय को छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट से राहत नहीं मिली है। जस्टिस नरेंद्र कुमार व्यास की सिंगल बेंच ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत आरोप तय करने के विशेष अदालत के आदेश को चुनौती देने वाली आपराधिक पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी।

हाईकोर्ट ने कहा कि जांच में जुटाए गए साक्ष्य इतने कमजोर या अविश्वसनीय नहीं हैं कि आरोप तय करने के आदेश में हस्तक्षेप किया जाए। अब मामले का ट्रायल आगे बढ़ेगा।

2005 में हुई थी तलाशी

डॉ. पांडेय ने जगदलपुर में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के विशेष न्यायाधीश की ओर से 30 नवंबर 2019 को पारित आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। विशेष अदालत ने उनके खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 13(1)(ई) और 13(2) के तहत आरोप तय किए थे।

अभियोजन के अनुसार, एंटी करप्शन ब्यूरो को सूचना मिली थी कि डॉ. पांडेय ने अपनी ज्ञात आय से अधिक चल-अचल संपत्ति अर्जित की है। दो मई 2005 को प्रारंभिक जांच के बाद तीन मई को तलाशी वारंट लिया गया और चार मई को जगदलपुर तथा रायपुर स्थित उनके आवासों पर तलाशी की गई।

करीब 57.84 लाख की संपत्ति मिलने का दावा

अभियोजन के मुताबिक, जगदलपुर स्थित आवास से करीब 8.97 लाख रुपये नकद, सोने-चांदी के आभूषण और अन्य संपत्तियां मिली थीं। दोनों आवासों से मिली चल-अचल संपत्ति का कुल मूल्य लगभग 57.84 लाख रुपये आंका गया। इसके बाद आठ मई 2005 को अपराध दर्ज किया गया और 29 नवंबर 2018 को आरोपपत्र दाखिल किया गया।

बचाव पक्ष ने संपत्ति के मूल्यांकन पर उठाए सवाल

डॉ. पांडेय की ओर से दलील दी गई कि संपत्ति का मूल्य वास्तविक खरीद मूल्य के बजाय बढ़ाकर आंका गया। कुछ संपत्तियां परिजनों की स्वतंत्र आय से खरीदी गई थीं, लेकिन जांच एजेंसी ने उन्हें भी उनके नाम की संपत्ति मान लिया। बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि आयकर रिटर्न और दूसरे सरकारी दस्तावेजों पर पर्याप्त विचार नहीं किया गया।

जांच में 13 साल से ज्यादा की देरी को भी कार्यवाही रद्द करने का आधार बताया गया। राज्य सरकार ने इसका विरोध करते हुए कहा कि जांच के दौरान ऐसे तथ्य सामने आए हैं, जिनसे प्रथम दृष्टया आय से अधिक संपत्ति का मामला बनता है। सरकार के मुताबिक, जांच के दौरान याचिकाकर्ता ने कई कानूनी कार्यवाहियां भी शुरू की थीं और अंतरिम राहत हासिल की थी।

दोष तय नहीं हुआ, ट्रायल में परखे जाएंगे साक्ष्य

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि संपत्ति के वैध स्रोत, परिजनों की आय और संपत्तियों के मूल्यांकन से जुड़े सवालों का फैसला ट्रायल के दौरान पेश साक्ष्यों के आधार पर होगा। आरोप तय करने के चरण में अदालत को यह तय नहीं करना होता कि आरोपी दोषी है या नहीं, बल्कि यह देखना होता है कि मुकदमा चलाने के लिए प्रथम दृष्टया पर्याप्त आधार मौजूद हैं या नहीं।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का उल्लेख करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि भ्रष्टाचार के मामलों में जांच और अभियोजन में हस्तक्षेप केवल असाधारण परिस्थितियों में किया जाना चाहिए। इस मामले में ऐसी कोई परिस्थिति नहीं मिली।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि उसकी टिप्पणियां केवल आरोप तय करने के आदेश की समीक्षा तक सीमित हैं। ट्रायल कोर्ट साक्ष्यों के आधार पर स्वतंत्र रूप से अंतिम फैसला करेगा।

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