पत्नी पर क्रूरता, छोड़कर जाने और व्यभिचार के आरोप साबित नहीं कर सका पति; समझौते के बाद पत्नी को साथ रखने से मुकरने की बात भी आई सामने

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने तलाक की मांग करने वाले एक पति की अपील खारिज करते हुए स्पष्ट किया है कि दहेज प्रताड़ना के आपराधिक मामले में पति का बरी हो जाना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि पत्नी ने झूठे आरोप लगाकर उसके साथ मानसिक क्रूरता की थी। अदालत ने कहा कि तलाक के लिए लगाए गए क्रूरता, परित्याग और व्यभिचार के आरोपों को पति ठोस साक्ष्यों से साबित नहीं कर सका।

जस्टिस पार्थ प्रतीम साहू और जस्टिस सुषमा सावंत की खंडपीठ ने राजनांदगांव परिवार न्यायालय के फैसले को बरकरार रखते हुए पति की अपील खारिज कर दी। परिवार न्यायालय ने हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13 के तहत दायर उसकी तलाक याचिका पहले ही खारिज कर दी थी।

शादी के कुछ महीनों बाद अलग रहने लगे थे पति-पत्नी

दोनों का विवाह 23 मार्च 2010 को हिंदू रीति-रिवाज से हुआ था। पति का आरोप था कि शादी के शुरुआती दिनों से ही संबंध तनावपूर्ण थे। उसने दावा किया कि पत्नी ने शादी की पहली रात ही एक पुलिस आरक्षक के साथ पूर्व संबंध होने की बात कही थी और वैवाहिक जीवन जारी रखने से अनिच्छा जताई थी। पति ने पत्नी पर अपने और परिवार के साथ झगड़ा करने तथा झूठे मामले में फंसाने की धमकी देने का भी आरोप लगाया।

पति के मुताबिक, पत्नी 22 नवंबर 2010 को ससुराल छोड़कर चली गई और बाद में दहेज प्रताड़ना की शिकायत दर्ज कराई। इसके आधार पर उसके खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 498ए और 34 के तहत मामला दर्ज हुआ। पति ने यह भी आरोप लगाया कि पत्नी ने 22 जून 2013 को देवाशीष नायक से शादी कर ली और उसके साथ पत्नी के रूप में रहने लगी। इसी आधार पर उसने क्रूरता, परित्याग और व्यभिचार के आधार पर तलाक मांगा।

पत्नी ने कहा- पति ने ही घर से निकाला

पत्नी ने पूर्व संबंध होने और अन्य आरोपों से इनकार किया। उसका कहना था कि पति और उसके परिवार के लोग कम दहेज के लिए प्रताड़ित करते थे और 19 सितंबर 2010 को उसे जबरन मायके भेज दिया गया था। उसने दावा किया कि वह वैवाहिक जीवन दोबारा शुरू करने के लिए तैयार थी और इस संबंध में समाज के लोगों के माध्यम से सुलह की कोशिश भी की थी।

पत्नी ने वैवाहिक अधिकारों की बहाली के लिए दुर्ग परिवार न्यायालय में हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 9 के तहत कार्यवाही भी शुरू की थी। परिवार न्यायालय ने सभी प्रमुख मुद्दों पर पति के खिलाफ निष्कर्ष देते हुए तलाक की मांग खारिज कर दी थी।

गवाहों को घटना की प्रत्यक्ष जानकारी नहीं थी

हाईकोर्ट में पति की ओर से दलील दी गई कि परिवार न्यायालय ने क्रूरता, परित्याग और व्यभिचार से जुड़े साक्ष्यों का सही आकलन नहीं किया। उसने 16 नवंबर 2018 को धारा 498ए के मामले में बरी होने का हवाला देते हुए कहा कि पत्नी के आरोप झूठे साबित हुए थे और इससे मानसिक क्रूरता स्थापित होती है।

खंडपीठ ने पाया कि पति की ओर से पेश दो गवाहों ने जिरह के दौरान स्वीकार किया कि उन्हें पति-पत्नी के बीच हुई घटनाओं की प्रत्यक्ष जानकारी नहीं थी। उनकी बातें सुनी-सुनाई जानकारी पर आधारित थीं। इसलिए उनकी गवाही से पति के आरोपों को ठोस समर्थन नहीं मिला।

पत्नी को वापस लेने से इनकार करने की बात भी सामने आई

परित्याग के आरोप पर हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसा कोई ठोस साक्ष्य नहीं है जिससे साबित हो कि पत्नी बिना उचित कारण पति से अलग रह रही थी। पति ने जिरह में स्वीकार किया था कि विवाद सुलझाने के लिए पत्नी ने सामाजिक बैठक बुलाई थी, लेकिन उसने पत्नी को वापस साथ रखने से इनकार कर दिया।

रिकॉर्ड में यह भी सामने आया कि पत्नी ने दुर्ग परिवार न्यायालय में वैवाहिक अधिकारों की बहाली के लिए याचिका दायर की थी और उस कार्यवाही में पति के खिलाफ आदेश पारित हुआ था। इन तथ्यों के आधार पर अदालत ने माना कि पत्नी के जानबूझकर वैवाहिक संबंध छोड़ने का आरोप साबित नहीं हुआ।

दूसरी शादी के आरोप पर भी नहीं मिला ठोस सबूत

व्यभिचार के आरोप पर खंडपीठ ने पाया कि पति ने मुकदमे के दौरान यह आधार उठाया और देवाशीष नायक को भी पक्षकार बनाया, लेकिन कथित दूसरी शादी के बारे में जानकारी मिलने का स्पष्ट आधार नहीं बताया।

अदालत ने संबंधित दस्तावेजों पर गौर करते हुए कहा कि कथित विवाह के महज 22-23 दिन बाद धारा 9 के तहत दायर एक कार्यवाही पहली ही सुनवाई में वापस ले ली गई थी। इससे दूसरी शादी होने का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। पति ने जिरह के दौरान पत्नी से इन दस्तावेजों के संबंध में सवाल भी नहीं किए।

खंडपीठ ने पति के आरोपों की तुलना में पत्नी के पक्ष को अधिक विश्वसनीय पाया। अदालत को विवाह से पहले किसी अन्य व्यक्ति के साथ संबंध होने के आरोप के समर्थन में भी कोई ठोस साक्ष्य नहीं मिला।

समझौते के बाद पति के आचरण को भी अदालत ने देखा

मामले में पत्नी की शिकायत पर भारतीय दंड संहिता की धारा 307 के तहत दर्ज आपराधिक प्रकरण भी सामने आया। रिकॉर्ड के अनुसार, समझौते के बाद पत्नी ने अभियोजन का समर्थन नहीं किया, जिसके परिणामस्वरूप पति बरी हो गया। हालांकि, पति ने बाद में पत्नी को साथ रखने का वादा पूरा नहीं किया।

पति ने यह आपत्ति उठाई थी कि समझौते से संबंधित हलफनामा उस समय बनाया गया, जब वह हिरासत में था। हाईकोर्ट ने माना कि पति हिरासत में था, लेकिन ऐसा कोई साक्ष्य नहीं था जिससे साबित हो कि हलफनामा तैयार करने के लिए मजिस्ट्रेट की अनुमति नहीं ली गई थी। उसने हलफनामे को जाली भी नहीं बताया था और न ही उसके निष्पादन से स्पष्ट रूप से इनकार किया था।

अदालत ने कहा कि उपलब्ध दस्तावेज पत्नी के इस पक्ष का समर्थन करते हैं कि पति ने समझौते के बाद भी उसे साथ रखने से इनकार किया। यह आचरण उसके इस दावे को कमजोर करता है कि पत्नी ही वैवाहिक संबंध निभाने के लिए तैयार नहीं थी।

क्रूरता का आकलन परिस्थितियों के आधार पर होगा

खंडपीठ ने कहा कि वैवाहिक मामलों में क्रूरता का आकलन हर व्यक्ति और मामले की परिस्थितियों के अनुसार किया जाना चाहिए। इसके लिए पूरे साक्ष्य का समग्र मूल्यांकन जरूरी है। आपराधिक मुकदमे और वैवाहिक विवाद में साक्ष्यों के आकलन के सिद्धांत भी अलग-अलग हो सकते हैं।

अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल आपराधिक मामले में बरी होने के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि पत्नी ने झूठे आरोप लगाकर पति के साथ क्रूरता की। तलाक के लिए कानून में निर्धारित आधारों को स्वतंत्र और विश्वसनीय साक्ष्यों से साबित करना जरूरी है।

खंडपीठ ने निष्कर्ष निकाला कि पति यह साबित नहीं कर सका कि पत्नी ने बिना उचित कारण उसका साथ छोड़ा, व्यभिचार किया या उसके साथ क्रूरता की। परिवार न्यायालय के फैसले में हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं मिला। इसके साथ ही अपील खारिज कर दी गई और डिक्री तैयार करने का निर्देश दिया गया।

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