सरकंडा थाने के 2,925 क्लोनाजेपाम टैबलेट बरामदगी मामले में जांच पर उठे सवाल, DGP से व्यक्तिगत शपथपत्र मांगा
बिलासपुर। बिलासपुर के सारकंडा थाने में दर्ज NDPS मामले की जांच प्रक्रिया पर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने गंभीर सवाल उठाए हैं। कोर्ट ने सीधे पूछा है कि जिस पुलिस अधिकारी ने प्रारंभिक शिकायत (देहाती नालिश) दर्ज कराई, उसे ही आगे जांच अधिकारी बनाकर चार्जशीट दाखिल करने की जिम्मेदारी कैसे दी गई।
मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने मामले को गंभीरता से लेते हुए पुलिस महानिदेशक (DGP) से व्यक्तिगत शपथपत्र के साथ जवाब मांगा है। कोर्ट ने संबंधित पुलिस अधिकारी शैलेंद्र सिंह के पूर्व आचरण और सेवा रिकॉर्ड से जुड़ी जानकारी भी मांगी है। मामले की अगली सुनवाई 24 अगस्त 2026 को होगी।
2,925 क्लोनाजेपाम टैबलेट की बरामदगी
मामला 15 फरवरी 2026 को सरकंडा थाना क्षेत्र में 2,925 क्लोनाजेपाम (रिवोट्रिल) टैबलेट की बरामदगी से जुड़ा है। पुलिस के अनुसार, इनका कुल वजन करीब 438.750 ग्राम था। मामले में एक महिला के खिलाफ नारकोटिक्स ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस एक्ट, 1985 (मादक औषधि एवं मनोरोगी पदार्थ अधिनियम) के तहत अपराध दर्ज कर चार्जशीट पेश की गई।
हालांकि, महिला की ओर से दायर याचिका में पूरी कार्रवाई पर गंभीर आरोप लगाए गए हैं। याचिकाकर्ताओं के अनुसार, एक 14 वर्षीय बच्चा छत पर पतंग उड़ा रहा था, तभी उसे एक पॉलीथिन मिली। मोबाइल पर जानकारी जुटाने के बाद उसने अपनी मां को बताया और परिवार ने उस पॉलीथिन को कचरा समझकर सीढ़ियों के पास रख दिया।
बाद में सुबह करीब 7:35 बजे पुलिस घर पहुंची। छत की तलाशी में कुछ नहीं मिला, लेकिन सीढ़ियों के पास रखी वही पॉलीथिन पुलिस ने बरामद कर ली। पुलिस का दावा है कि उसमें 2,925 क्लोनाजेपाम टैबलेट थीं।
पारिवारिक विवाद से साजिश के आरोप
महिला पक्ष ने मामले को पारिवारिक विवाद से जोड़ते हुए उसे फंसाने की साजिश का आरोप लगाया है। याचिका के अनुसार, महिला का पति मेडिकल दुकान चलाता है और दोनों के बीच लंबे समय से विवाद चल रहा है। भरण-पोषण, बच्चे की कस्टडी और तलाक से जुड़े विवाद भी बताए गए हैं।
याचिकाकर्ताओं ने यह भी आरोप लगाया कि कथित कार्रवाई से पहले महिला का पति और एक रिश्तेदार सरकंडा थाने में मौजूद थे। इन परिस्थितियों की निष्पक्ष जांच की मांग की गई है।
नाबालिग को 10 घंटे थाने में रखने का आरोप
मामले में पुलिस की भूमिका खासकर एक एएसआई शैलेंद्र सिंह को लेकर गंभीर आरोप लगाया गया है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि बच्चे के खिलाफ कोई FIR दर्ज नहीं थी, इसके बावजूद उसे करीब 10 घंटे थाने में रखा गया। बच्चा लगातार पुलिस को बताता रहा कि उसे बैग छत पर मिला था और उसने उसे सीढ़ियों के पास रखा था।
याचिकाकर्ताओं ने बच्चे के मोबाइल की फोरेंसिक जांच, दवाओं के स्रोत का पता लगाने और बैग को मूल रूप से छत तक पहुंचाने वाले व्यक्ति की पहचान की मांग की है।
अब हाईकोर्ट के निर्देश के बाद DGP को यह स्पष्ट करना होगा कि शिकायतकर्ता अधिकारी को ही जांच की जिम्मेदारी किस आधार पर दी गई और जांच की निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए क्या कदम उठाए गए। 24 अगस्त की सुनवाई में पुलिस का जवाब इस मामले की आगे की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण हो सकता है।














