बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि किसी सरकारी कर्मचारी पर भले ही छोटी सजा का प्रस्ताव हो, लेकिन कार्रवाई से पहले उसे आरोपों और प्रस्तावित दंड के संबंध में अपना पक्ष रखने का उचित अवसर देना जरूरी है। कोर्ट ने कहा कि प्राकृतिक न्याय के इस मूल सिद्धांत को केवल इसलिए दरकिनार नहीं किया जा सकता क्योंकि प्रस्तावित दंड मामूली है।
न्यायमूर्ति बिभु दत्ता गुरु ने 23 सितंबर को मामले की सुनवाई करते हुए कोरबा में ग्रामीण यांत्रिकी सेवा में पदस्थ एक सहायक ड्राफ्ट्समैन की एक वार्षिक वेतनवृद्धि रोकने संबंधी आदेश को निरस्त कर दिया। वेतनवृद्धि बिना संचयी प्रभाव के रोकी गई थी।
समीक्षा बैठक में गलत जानकारी देने का आरोप
मामला निर्माण कार्यों को लेकर 10 जून को हुई एक समीक्षा बैठक से जुड़ा था। कर्मचारी पर बैठक में कथित तौर पर गलत जानकारी प्रस्तुत करने का आरोप लगाया गया था। कर्मचारी का कहना था कि उसके द्वारा दी गई जानकारी फील्ड अधिकारियों से प्राप्त सामग्री के आधार पर थी।
इसके अगले ही दिन यानी 11 जून को विभाग ने उसके खिलाफ एक वेतनवृद्धि रोकने का दंड आदेश जारी कर दिया। कर्मचारी ने हाईकोर्ट में चुनौती देते हुए कहा कि दंड देने से पहले न तो उसे लिखित रूप से प्रस्तावित कार्रवाई और आरोपों की जानकारी दी गई और न ही अपना पक्ष रखने का अवसर मिला।
बाद में दिया गया जवाब कार्रवाई की कमी पूरी नहीं कर सकता
अधिकारियों की ओर से यह तर्क दिया गया कि कर्मचारी ने बाद में अपना पक्ष प्रस्तुत कर दिया था। हालांकि, कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। कर्मचारी की ओर से 15 जून को प्रतिनिधित्व दिया गया था, जबकि दंड आदेश 11 जून को ही जारी किया जा चुका था।
हाईकोर्ट ने माना कि जवाब या प्रतिनिधित्व दंड लगाए जाने से पहले लिया जाना चाहिए था। बाद में कर्मचारी को अपना पक्ष रखने का अवसर देना उस मूल प्रक्रिया संबंधी कमी को दूर नहीं कर सकता।
नियम 16(1)(a) का पालन जरूरी
कोर्ट ने छत्तीसगढ़ सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियम, 1966 के नियम 16(1)(a) का उल्लेख करते हुए कहा कि मामूली दंड के मामलों में भी निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना अनिवार्य है।
इस नियम के तहत सरकारी कर्मचारी को प्रस्तावित कार्रवाई और उसके आधार बने आरोपों की लिखित जानकारी दी जानी चाहिए तथा उसे अपना पक्ष रखने के लिए उचित अवसर मिलना चाहिए। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि दंड की प्रकृति छोटी होने के कारण इस अनिवार्य सुरक्षा को समाप्त नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट ने संबंधित दंड आदेश को निरस्त कर दिया। हालांकि, कोर्ट ने अनुशासनात्मक प्राधिकारी के लिए कानून के अनुसार नए सिरे से कार्रवाई करने का रास्ता खुला रखा है।














