असिस्टेंट प्रोफेसर के खिलाफ FIR की सिफारिश में आयोग ने धारा 3(1) का आरोप ‘सिद्ध’ माना था, कोर्ट ने कहा- आपराधिक दोष तय करना न्यायालय का अधिकार
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने राज्य अनुसूचित जाति आयोग की शक्तियों की सीमा स्पष्ट करते हुए कहा है कि आयोग किसी शिकायत की जांच कर सकता है, दस्तावेज और साक्ष्य जुटा सकता है तथा संबंधित प्राधिकारी को कार्रवाई की सिफारिश कर सकता है, लेकिन वह किसी व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक आरोप को स्वयं सिद्ध घोषित नहीं कर सकता। अपराध सिद्ध हुआ है या नहीं, इसका निर्धारण सक्षम आपराधिक न्यायालय के अधिकार क्षेत्र में आता है।
जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद की एकलपीठ ने कोरबा जिले के शासकीय महाविद्यालय बरपाली में सहायक प्राध्यापक मृगेश कुमार यादव की याचिका पर 8 सितंबर 2026 को यह फैसला सुनाया। कोर्ट ने छत्तीसगढ़ राज्य अनुसूचित जाति आयोग की 16 मार्च 2021 की उस सिफारिश को रद्द कर दिया, जिसमें यादव के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने की अनुशंसा की गई थी।
नकल के मामले से शुरू हुआ विवाद
मामला एक छात्रा की शिकायत से जुड़ा था। अदालत के आदेश के अनुसार, परीक्षा के दौरान सहायक प्राध्यापक मृगेश कुमार यादव और एक अन्य शिक्षिका ने छात्रा को कथित तौर पर नकल करते पकड़ा था। इसके बाद छात्रा ने आयोग में शिकायत करते हुए आरोप लगाया कि नकल के मामले को लेकर उसे दबाव और उत्पीड़न का सामना करना पड़ा।
आयोग ने 21 जनवरी 2020 को यादव को नोटिस जारी कर जवाब मांगा था। यादव ने 3 फरवरी 2020 को अपना जवाब दिया और बताया कि समान आरोपों की पहले जांच हो चुकी है तथा शिकायत को झूठा पाया गया था। इसके बावजूद आयोग ने 16 मार्च 2021 को उनके खिलाफ FIR दर्ज करने की सिफारिश कर दी।
‘सिफारिश’ के नाम पर अपराध सिद्ध नहीं कर सकता आयोग
याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि आयोग ने केवल FIR की सिफारिश नहीं की, बल्कि अपने आदेश में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 की धारा 3(1) के तहत लगाए गए आरोप को सिद्ध भी घोषित कर दिया। इस तरह आयोग ने आपराधिक अदालत के अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप किया।
आयोग की ओर से इसका विरोध करते हुए कहा गया कि उसने शिकायत और उपलब्ध सामग्री पर विचार करने के बाद केवल FIR दर्ज करने की सिफारिश की थी।
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का भी दिया हवाला
हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में सुप्रीम कोर्ट के Bhabani Prasad Jena बनाम Convenor Secretary, Orissa State Commission for Women मामले का हवाला दिया। इसमें स्पष्ट किया गया था कि आयोग शिकायत प्राप्त कर सकता है, उसकी जांच कर सकता है और संबंधित अधिकारियों के समक्ष राहत या कार्रवाई के लिए मामला उठा सकता है, लेकिन पक्षकारों के अधिकारों का न्यायिक निर्धारण करने का अधिकार आयोग को नहीं है।
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के हालिया Mumbai Port Authority बनाम National Commission for Scheduled Castes फैसले को भी आधार बनाया। हाईकोर्ट के अनुसार, आयोग को सिविल कोर्ट जैसी जो शक्तियां दी गई हैं, वे सीमित हैं। आयोग दस्तावेज मंगा सकता है, साक्ष्य प्राप्त कर सकता है और तथ्यात्मक निष्कर्ष दर्ज कर सकता है, लेकिन उन निष्कर्षों के आधार पर पक्षकारों के अधिकारों का अंतिम निर्धारण नहीं कर सकता।
हाईकोर्ट ने कहा- अधिकार क्षेत्र से बाहर गया आयोग
हाईकोर्ट ने कहा कि मौजूदा मामले में आयोग ने अपनी अधिकार-सीमा पार की, क्योंकि उसने स्पष्ट रूप से दर्ज किया कि 1989 के कानून की धारा 3(1) के तहत याचिकाकर्ता के खिलाफ आरोप सिद्ध है। कोर्ट के अनुसार, किसी आपराधिक आरोप के इस तरह सिद्ध होने का निर्धारण आपराधिक अदालत के अधिकार क्षेत्र में आता है।
इसी आधार पर हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए आयोग की 16 मार्च 2021 की विवादित सिफारिश को रद्द कर दिया।
फैसले का व्यापक महत्व
इस फैसले से वैधानिक आयोगों की भूमिका को लेकर एक महत्वपूर्ण कानूनी सीमा सामने आती है। आयोग तथ्यों की जांच और कार्रवाई की सिफारिश कर सकते हैं, लेकिन किसी व्यक्ति को आपराधिक रूप से दोषी ठहराने या अपराध सिद्ध घोषित करने का काम न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से ही किया जा सकता है।














