बीमारी का हवाला देकर लंबी छुट्टी मांगने वाले जवान के मेडिकल दस्तावेजों पर उठे थे सवाल; कोर्ट ने कहा- अनुशासित बल में मनमानी अनुपस्थिति स्वीकार नहीं
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने छह महीने से अधिक समय तक ड्यूटी से अनुपस्थित रहे केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) के एक कांस्टेबल को सेवा से हटाने के फैसले को सही ठहराया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अनुशासित और सशस्त्र बल के सदस्य को ऐसे आधारों पर ड्यूटी से लंबे समय तक अनुपस्थित रहने की अनुमति नहीं दी जा सकती, जिन्हें विश्वसनीय नहीं माना गया हो। ऐसी लापरवाही पर नरमी बरतने से बल के अनुशासन और कार्यप्रणाली पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है।
यह फैसला 9 सितंबर को 34 वर्षीय पूर्व CRPF कांस्टेबल की याचिका पर सुनवाई के दौरान आया। उसने 2018 में सेवा से हटाने के आदेश और उसके खिलाफ हुई विभागीय कार्रवाई को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति नरेश कुमार चंद्रवंशी ने की।
बीमारी का हवाला, छह महीने के आराम की मेडिकल सलाह
याचिकाकर्ता के अनुसार वह मार्च 2009 में CRPF में कांस्टेबल के पद पर भर्ती हुआ था और आठ साल से अधिक सेवा पूरी करने के बाद स्थायी कर्मचारी बन गया था। उसे 13 फरवरी से 14 मार्च 2017 तक एक महीने की मेडिकल छुट्टी मिली थी।
उसका कहना था कि स्वास्थ्य में सुधार नहीं होने पर उसने छह महीने की अतिरिक्त छुट्टी के लिए आवेदन किया और मेडिकल दस्तावेज भी प्रस्तुत किए। दस्तावेजों में एनीमिया, नॉन-इक्टेरस हेपेटाइटिस और एंटेरिक फीवर जैसी बीमारियों का उल्लेख करते हुए छह महीने के बेड रेस्ट की सलाह दी गई थी।
हालांकि विभाग ने अप्रैल 2017 में अतिरिक्त छुट्टी का अनुरोध खारिज कर दिया और उसे ड्यूटी पर लौटने का निर्देश दिया। इसके बावजूद वह निर्धारित समय पर ड्यूटी पर नहीं पहुंचा।
बार-बार निर्देश के बाद भी नहीं लौटा
याचिकाकर्ता ने दावा किया कि उसने 7 जून 2017 को ड्यूटी ज्वाइन करने की कोशिश की, लेकिन उसे ज्वाइन नहीं करने दिया गया। उसका यह भी कहना था कि वह 6 जून तक इलाज करा रहा था।
विभाग ने उसे 15 मार्च 2017 से अनधिकृत रूप से अनुपस्थित माना और उसके खिलाफ विभागीय कार्रवाई शुरू की। कोर्ट के मुताबिक, उसे कई बार ड्यूटी पर लौटने और विभागीय जांच में शामिल होने के अवसर दिए गए, लेकिन उसने निर्देशों का पालन नहीं किया।
बाद में उसे ‘Absconder’ घोषित किया गया और उसके खिलाफ वारंट भी जारी हुआ। इसके बावजूद उसकी अनुपस्थिति जारी रही। अंततः जून 2018 में उसे सेवा से हटा दिया गया। उसके खिलाफ की गई अपील भी 2019 में खारिज कर दी गई।
आखिरी दिन तैयार मेडिकल दस्तावेजों पर कोर्ट ने जताया संदेह
हाईकोर्ट ने कहा कि संबंधित मेडिकल दस्तावेजों को विभाग ने संदिग्ध माना था, क्योंकि वे स्वीकृत छुट्टी के अंतिम दिन तैयार किए गए थे और एक साथ छह महीने के बेड रेस्ट की सलाह दी गई थी।
कोर्ट ने यह भी गौर किया कि छुट्टी समाप्त होने के बाद कांस्टेबल न तो ड्यूटी पर लौटा और न ही अधिकारियों के निर्देश के अनुसार नागपुर स्थित CRPF अस्पताल में इलाज के लिए रिपोर्ट किया।
अदालत ने कहा कि चार्जशीट जारी होने से पहले का उसका आचरण भी अपने कर्तव्यों और वरिष्ठ अधिकारियों के वैध निर्देशों के प्रति पूरी तरह लापरवाह और गैर-जिम्मेदाराना था।
प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत के उल्लंघन की दलील खारिज
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता विवेक कुमार अग्रवाल ने दलील दी कि विभागीय जांच और सेवा से हटाने का अंतिम आदेश उसे उचित सुनवाई का अवसर दिए बिना पारित किया गया, जिससे प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन हुआ।
वहीं CRPF की ओर से केंद्र सरकार की अधिवक्ता अनमोल शर्मा ने कहा कि छुट्टी समाप्त होने के बाद कांस्टेबल को ड्यूटी पर लौटने के लिए कई अवसर दिए गए थे। विभागीय जांच में शामिल होने के लिए भी नोटिस दिए गए, लेकिन उसने न तो उनका जवाब दिया और न ही कार्यवाही में हिस्सा लिया।
हाईकोर्ट ने इन दलीलों पर विचार करने के बाद माना कि उसे पर्याप्त अवसर दिए गए थे। इसलिए प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन नहीं हुआ।
‘सेवा से हटाना अत्यधिक या असंगत नहीं’
अदालत ने कहा कि सशस्त्र और अनुशासित बल में तैनात कर्मचारी की लंबे समय तक अनधिकृत अनुपस्थिति को सामान्य कर्मचारी की अनुपस्थिति की तरह नहीं देखा जा सकता। ऐसे बलों की जिम्मेदारियों और कार्यप्रकृति को देखते हुए अनुशासन बनाए रखना आवश्यक है।
कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि मामले की परिस्थितियों में कांस्टेबल को सेवा से हटाने का निर्णय उचित था। यह कार्रवाई अत्यधिक या असंगत (excessive or disproportionate) नहीं कही जा सकती। हाईकोर्ट ने इस तरह सेवा से हटाने के विभागीय फैसले को बरकरार रखते हुए याचिका को राहत देने से इनकार कर दिया।














