NDPS मामले में चार आरोपियों की याचिका खारिज, हाईकोर्ट ने दिया पुलिस स्टेशनों में CCTV व्यवस्था दुरुस्त रखने के निर्देश

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि पुलिस थाने की CCTV रिकॉर्डिंग निर्धारित 18 महीने की अवधि पूरी होने के बाद सिस्टम से स्वत: डिलीट हो चुकी है और अब उपलब्ध नहीं है, तो ट्रायल कोर्ट भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 94 के तहत उसे पेश करने का आदेश देने के लिए बाध्य नहीं है। कोर्ट ने कहा कि किसी दस्तावेज या इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड को पेश कराने की शक्ति व्यापक जरूर है, लेकिन इसका इस्तेमाल ऐसे रिकॉर्ड के लिए नहीं किया जा सकता, जो वास्तव में उपलब्ध ही नहीं है।

मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने यह टिप्पणी चार एनडीपीएस आरोपियों की याचिका खारिज करते हुए की। आरोपियों ने गौरेला थाने की 36 घंटे की CCTV फुटेज सुरक्षित रखने और अदालत में पेश करने का निर्देश देने की मांग की थी।

18 महीने बाद स्वत: डिलीट हो गई थी फुटेज

याचिकाकर्ता बनवारी लाल गुप्ता, रोहित गुप्ता, अंकुल जैतवार और गोपाल पनाडिया उर्फ गोपी पनिका के खिलाफ गौरेला थाने में अपराध क्रमांक 304/2024 दर्ज है। मामला गांजा परिवहन से जुड़ा है और आरोपियों के खिलाफ एनडीपीएस एक्ट की धारा 20(बी) और 29 तथा बीएनएस की धारा 111 के तहत कार्रवाई की गई है।

चारों ने 23 मई 2025 को विशेष न्यायाधीश (एनडीपीएस), बिलासपुर के समक्ष BNSS की धारा 94 के तहत आवेदन दिया था। इसमें 13 सितंबर 2024 की मध्यरात्रि से 15 सितंबर 2024 की मध्यरात्रि तक की 36 घंटे की बिना एडिट की गई CCTV फुटेज उपलब्ध कराने की मांग की गई थी। इसके साथ 14 सितंबर 2024 के मोबाइल कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR) और टावर लोकेशन की जानकारी भी मांगी गई थी।

पुलिस की ओर से अदालत को बताया गया कि फुटेज सुरक्षित रखने के लिए पहले कोई न्यायिक निर्देश नहीं मिला था। विशेष न्यायाधीश के 5 मई 2026 को रिपोर्ट मांगने पर गौरेला थाना प्रभारी ने 15 मई को रिपोर्ट दी कि सितंबर 2024 की CCTV फुटेज निर्धारित 18 महीने की स्टोरेज अवधि पूरी होने के बाद सिस्टम से स्वत: डिलीट हो चुकी है।

आरोपियों का दावा- झूठा फंसाया गया

आरोपियों की ओर से कहा गया कि उनके वाहन से कथित मादक पदार्थ बरामद नहीं हुआ था। उनका दावा था कि उन्हें 14 सितंबर 2024 को ही गौरेला थाने में रोककर रखा गया था और बाद में झूठे मामले में फंसाया गया।

उन्होंने तर्क दिया कि एनडीपीएस एक्ट में आरोपियों के खिलाफ वैधानिक अनुमान लागू होने के कारण CCTV जैसे इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य उनके बचाव के लिए महत्वपूर्ण हैं। इसी आधार पर उन्होंने पुलिस थाने की फुटेज उपलब्ध कराने की मांग की थी।

कोर्ट ने कहा- हर रिकॉर्ड पेश कराने का आदेश नहीं दिया जा सकता

हाईकोर्ट ने BNSS की धारा 94 के दायरे पर विचार करते हुए कहा कि ट्रायल कोर्ट के पास दस्तावेज या अन्य सामग्री पेश कराने की व्यापक शक्ति है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि आरोपी के मांग करने मात्र से हर इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड उपलब्ध कराने का आदेश दिया जाए।

कोर्ट ने कहा कि इसके लिए संबंधित सामग्री का वास्तविक रूप से उपलब्ध होना और मामले के लिए उसकी प्रासंगिकता सामने आना जरूरी है। जब मांगी गई CCTV फुटेज सिस्टम में मौजूद ही नहीं है, तो ट्रायल कोर्ट द्वारा उसे पेश करने से इनकार करना गलत नहीं कहा जा सकता।

हाईकोर्ट ने समानांतर जांच से भी किया इनकार

डिवीजन बेंच ने संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए ट्रायल के दौरान न्यायिक हस्तक्षेप को लेकर भी सावधानी बरती। कोर्ट ने कहा कि रिट या निगरानी अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल चल रहे मुकदमे में समानांतर जांच शुरू करने या ट्रायल कोर्ट के विवेक को बदलने के लिए नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने यह भी पाया कि आरोपियों के CDR और लोकेशन संबंधी रिकॉर्ड पुलिस पहले ही विशेष न्यायाधीश के समक्ष प्रस्तुत कर चुकी है। इसलिए इस संबंध में आरोपियों की शिकायत समाप्त हो गई और उन्हें ट्रायल के दौरान इन रिकॉर्ड का इस्तेमाल करने की स्वतंत्रता रहेगी।

550 थानों में CCTV व्यवस्था अपग्रेड करने की योजना

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पुलिस थानों में CCTV व्यवस्था को लेकर सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के पालन की स्थिति की भी समीक्षा की। राज्य के मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक की ओर से व्यक्तिगत शपथपत्र पेश किए गए।

इनमें बताया गया कि राज्य स्तरीय और जिला स्तरीय निगरानी समितियां सक्रिय हैं तथा पुलिस थानों में अनिवार्य मासिक निरीक्षण की व्यवस्था लागू है। इसके अलावा वर्ष 2026-27 में पुलिस आधुनिकीकरण योजना के तहत राज्य के 550 पुलिस थानों में CCTV व्यवस्था को अपग्रेड करने के लिए 102.10 करोड़ रुपये के प्रस्ताव पर केंद्र सरकार द्वारा विचार किया गया है।

CCTV हर समय चालू रखने पर जोर

याचिका खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने राज्य सरकार और संबंधित निगरानी समितियों से सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का कड़ाई और लगातार पालन सुनिश्चित करने की अपेक्षा की। कोर्ट ने कहा कि सभी पुलिस थानों में CCTV कैमरे हर समय चालू रहें, नियमित निरीक्षण और निगरानी हो, पर्याप्त बिजली बैकअप और स्टोरेज क्षमता उपलब्ध रहे तथा कानून के अनुसार फुटेज निर्धारित अवधि तक सुरक्षित रखी जाए।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि प्रशासनिक या तकनीकी लापरवाही के कारण महत्वपूर्ण इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य नष्ट नहीं होना चाहिए।

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