अंबिकापुर फैमिली कोर्ट का आदेश रद्द; पति के व्यवहार को वैवाहिक जीवन के लिए गंभीर माना
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने वैवाहिक विवाद से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि पत्नी और उसकी बहनों को लगातार अभद्र संदेश भेजना मानसिक क्रूरता की श्रेणी में आ सकता है। कोर्ट ने इसी आधार पर अंबिकापुर के कुटुंब न्यायालय के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें पत्नी की तलाक की याचिका खारिज कर दी गई थी। हाईकोर्ट ने विवाह विच्छेद की अनुमति दे दी। यह फैसला 23 सितंबर को जस्टिस पार्थ प्रतीम साहू और जस्टिस सुषमा सावंत की युगलपीठ ने सुनाया।
2021 में हुआ था विवाह
मामले के अनुसार अर्चना सिंह का विवाह 5 दिसंबर 2021 को बिहार के भोजपुर निवासी आनंद कुमार गुप्ता से हुआ था। पत्नी की ओर से आरोप लगाया गया कि विवाह के कुछ समय बाद ही पति का व्यवहार उसके प्रति खराब हो गया। उसने मारपीट और गाली-गलौज करने तथा दहेज में एयर कंडीशनर की मांग किए जाने की बात कही। आरोप यह भी था कि मांग पूरी नहीं होने पर उसे गहने बेचने और जान से मारने की धमकी दी गई।
मायके आने के बाद भी नहीं रुका विवाद
विवाद बढ़ने पर पत्नी अंबिकापुर स्थित अपने मायके आ गई। इसके बाद भी पति की ओर से कथित तौर पर उसका पीछा नहीं छोड़ा गया। उसने पत्नी के मोबाइल पर और उसकी दो छोटी बहनों को WhatsApp के जरिए अभद्र संदेश भेजे। हाईकोर्ट के समक्ष इन संदेशों को भी वैवाहिक विवाद में मानसिक क्रूरता के प्रमाण के तौर पर रखा गया।
हाईकोर्ट ने क्यों माना मानसिक क्रूरता?
अदालत ने मामले में उपलब्ध साक्ष्यों और पक्षकारों के आचरण को देखते हुए पति की ओर से पत्नी और उसकी बहनों को भेजे गए अभद्र संदेशों को गंभीरता से लिया। न्यायालय के समक्ष पेश किए गए WhatsApp संदेशों को चुनौती नहीं दिए जाने का भी महत्व रहा। अदालत ने माना कि इस तरह का व्यवहार वैवाहिक संबंध में दूसरे पक्ष को मानसिक पीड़ा पहुंचाने वाला हो सकता है।
फैमिली कोर्ट का फैसला हुआ रद्द
अंबिकापुर कुटुंब न्यायालय ने पहले पत्नी की तलाक की अर्जी खारिज कर दी थी। इसके खिलाफ पत्नी ने हाईकोर्ट में अपील की। सुनवाई के बाद हाईकोर्ट की युगलपीठ ने निचली अदालत के आदेश को निरस्त करते हुए अर्चना सिंह और आनंद कुमार गुप्ता के विवाह को भंग करने का आदेश दिया।
मानसिक क्रूरता के लिए हर बार शारीरिक हिंसा जरूरी नहीं
वैवाहिक मामलों में मानसिक क्रूरता का आकलन केवल शारीरिक हिंसा के आधार पर नहीं किया जाता। अदालतें पति या पत्नी के लगातार अपमानजनक, धमकी भरे या मानसिक पीड़ा पहुंचाने वाले व्यवहार को भी परिस्थितियों के आधार पर देखती हैं। हालांकि सामान्य वैवाहिक मतभेद या रोजमर्रा के छोटे-मोटे विवाद अपने आप में मानसिक क्रूरता नहीं माने जाते।














