The Indian Express की पड़ताल में दो चुनाव आयुक्तों के सवाल उठाने का दावा;
आयोग ने कहा- सभी फैसले सर्वसम्मति से हुए, आंतरिक टिप्पणियां सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा
नई दिल्ली। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी Special Intensive Revision (SIR) को लेकर बुधवार को चुनाव आयोग के भीतर कथित मतभेद की रिपोर्ट सामने आने के बाद राजनीतिक विवाद तेज हो गया। The Indian Express की एक विस्तृत पड़ताल के अनुसार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार आयोग के फैसलों और आदेशों पर लिखित आपत्तियां दर्ज कीं। रिपोर्ट के मुताबिक, इन आपत्तियों में नए मतदाताओं को जोड़ने, मतदाताओं के नाम हटाने, बहाल किए गए नामों के खिलाफ अपील और मतदाता सूची के डिजिटल डेटाबेस की निगरानी जैसे मुद्दे शामिल थे।
रिपोर्ट के मुताबिक, दोनों आयुक्तों ने कुछ कदमों को ‘अनधिकृत’ और ‘अवैध’ बताते हुए सवाल उठाए और मतदाता डेटाबेस तक पहुंच को दिल्ली में केंद्रीकृत किए जाने को लेकर भी चिंता जताई। Indian Express का दावा है कि इनमें से कुछ आपत्तियां मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार को भी भेजी गई थीं। एक मामले में दोनों आयुक्तों ने मतदाता सूची के आईटी ढांचे की निगरानी से जुड़ी कार्य-विभाजन व्यवस्था को लेकर कैबिनेट सचिव को भी लिखा।
Form 6 में बदलाव पर भी उठे सवाल
पड़ताल का एक प्रमुख हिस्सा नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले Form 6 में बदलाव से जुड़ा है। रिपोर्ट के अनुसार, इस वर्ष जुलाई में Form 6 में ऐसा प्रश्न जोड़ा गया जिसमें नए मतदाता से पूछा गया कि उसका या उसके माता-पिता अथवा दादा-दादी का नाम पिछली SIR के समय की मतदाता सूची में था या नहीं।
रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयुक्त विवेक जोशी ने 16 मई को इस बदलाव पर आपत्ति दर्ज करते हुए कहा था कि Form 6 वैधानिक नियमों के तहत निर्धारित है और उसमें बदलाव के लिए Registration of Electors Rules, 1960 में संशोधन जरूरी होगा। चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू ने भी इस राय से सहमति जताई थी। इसके बावजूद बाद में यह बदलाव पोर्टल पर दिखाई दिया।
Indian Express की रिपोर्ट के अनुसार, संधू ने अगस्त में इस बदलाव को ‘अनधिकृत और अवैध’ बताते हुए इसे तत्काल हटाने की बात कही थी।
मतदाता डेटाबेस के केंद्रीकरण पर चिंता
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि दोनों चुनाव आयुक्तों ने ERONet और ECINet जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म पर मतदाता सूची के नियंत्रण को लेकर सवाल उठाए। विवेक जोशी ने कथित तौर पर मतदाता डेटाबेस के धीरे-धीरे केंद्रीकरण पर चिंता जताई और यह सुनिश्चित करने के लिए ऑडिट का सुझाव दिया कि किसी भी मतदाता सूची में बदलाव का अधिकार केवल संबंधित वैधानिक अधिकारियों के पास रहे।
चुनाव आयोग ने हालांकि अपने जवाब में कहा कि उसके डिजिटल प्लेटफॉर्म कड़े डेटा-सुरक्षा प्रोटोकॉल के तहत संचालित होते हैं और Electoral Registration Officers तथा District Election Officers कानून के तहत मिले अधिकारों के अनुसार काम करते हैं।
चुनाव आयोग का जवाब- सभी फैसले सर्वसम्मति से हुए
रिपोर्ट सामने आने के बाद चुनाव आयोग ने बुधवार को अपना पक्ष रखा। आयोग ने कहा कि किसी संस्थान के भीतर अलग-अलग राय और टिप्पणियां होना सामान्य निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा है। उसके अनुसार, सदस्यों की लिखित टिप्पणियां, तकनीकी सुझाव और आंतरिक जांच-पड़ताल संस्थागत प्रक्रिया का हिस्सा हैं।
आयोग ने यह भी कहा कि पिछले एक वर्ष में लिए गए उसके सभी फैसले, जिनमें देशभर में मतदाता सूची का पुनरीक्षण और SIR भी शामिल है, पूरे आयोग की सर्वसम्मति से लिए गए। आयोग ने लगभग 40 नई पहलों और कई चुनाव सुधारों का भी उल्लेख किया।
हालांकि, Indian Express की बाद की रिपोर्ट में कहा गया कि आयोग ने 14 आंतरिक टिप्पणियों के अस्तित्व, उनकी तारीखों या सामग्री को खारिज नहीं किया, लेकिन उसने यह स्पष्ट नहीं किया कि Form 6 में बदलाव किसने अधिकृत किया, कुछ अन्य प्रक्रियाओं को लेकर आपत्तियों का समाधान कैसे हुआ और मई से अगस्त के बीच पूर्ण आयोग की बैठक क्यों नहीं हुई।
विपक्ष ने मांगा CEC के खिलाफ कार्रवाई पर जवाब
रिपोर्ट सामने आने के बाद कांग्रेस सहित कई विपक्षी दलों ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार की भूमिका पर सवाल उठाए। राहुल गांधी ने SIR और मतदाता सूची को लेकर अपने पुराने ‘वोट चोरी’ आरोप दोहराते हुए इसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर गंभीर हमला बताया। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने कहा कि विपक्षी सांसद पहले भी CEC को हटाने के लिए नोटिस दे चुके हैं और अब उस पर कार्रवाई की मांग की।
कांग्रेस नेता अभिषेक मनु सिंघवी ने CEC के इस्तीफे की मांग की, जबकि मनोज तिवारी ने कहा कि यदि रिपोर्ट में सामने आए तथ्य सही हैं तो चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और निर्णय प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं।
तृणमूल कांग्रेस के डेरेक ओ’ब्रायन ने भी राज्यसभा में CEC को हटाने के लिए पहले दिए गए नोटिस को आगे बढ़ाने की मांग की। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने CEC के खिलाफ कार्रवाई और SIR से पहले की मतदाता सूची के आधार पर नए सिरे से चुनाव कराने की मांग की। AAP नेता अरविंद केजरीवाल ने पूरे SIR को रद्द करने की मांग की। DMK प्रमुख एमके स्टालिन ने SIR रोकने और आयोग के भीतर हुई घटनाओं की जांच की मांग की।
वाम दलों ने भी CEC के खिलाफ कार्रवाई और SIR रोकने की मांग की। CPI(M) ने कहा कि रिपोर्ट से चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर गंभीर सवाल उठते हैं। CPI महासचिव डी. राजा ने भी CEC के इस्तीफे की मांग की।
भाजपा ने कहा- मतभेद नहीं, लोकतांत्रिक विचार-विमर्श
भाजपा ने विपक्ष के आरोपों को खारिज करते हुए चुनाव आयुक्तों के बीच होने वाली चर्चा को संस्थागत लोकतंत्र का हिस्सा बताया। भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा ने कहा कि यदि तीनों चुनाव आयुक्त किसी मुद्दे पर चर्चा और विचार-विमर्श करते हैं तो इसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया के रूप में देखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि SIR अंततः तीनों आयुक्तों की सर्वसम्मति से हुआ।
भाजपा का यह पक्ष चुनाव आयोग के उस जवाब से भी मेल खाता है जिसमें आयोग ने कहा है कि अंतिम निर्णय पूरे आयोग की सर्वसम्मति से लिए गए हैं। इस तरह एक ओर रिपोर्ट में दर्ज अलग-अलग आपत्तियां हैं, वहीं आयोग और भाजपा इन टिप्पणियों को अंतिम फैसलों से पहले होने वाली सामान्य आंतरिक प्रक्रिया बता रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने भी दिल्ली SIR पर जताई चिंता
इसी बीच दिल्ली में SIR से जुड़े एक मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने निर्वाचन आयोग को जारी किए गए नोटिसों की प्रक्रिया पर सवाल उठाए। अदालत ने कहा कि कुछ नोटिस ‘यांत्रिक’ तरीके से जारी किए गए प्रतीत होते हैं और आयोग से यह देखने को कहा कि क्या उन्हें भेजने से पहले अतिरिक्त जांच-फिल्टर की जरूरत है।
दिल्ली में SIR के दौरान 33 लाख से अधिक मतदाताओं को विभिन्न कारणों से नोटिस दिए जाने और 47 लाख से अधिक नामों के मसौदा मतदाता सूची से हटाए जाने की जानकारी अदालत के समक्ष रखी गई। आयोग ने बताया कि दिल्ली में SIR के लिए करीब 14,000 बूथ लेवल अधिकारी और 1,200 निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी लगाए गए हैं।
अब सवाल SIR की प्रक्रिया और आयोग की आंतरिक कार्यप्रणाली पर
23 सितंबर की शाम तक सामने आए घटनाक्रम में दो अलग-अलग पक्ष स्पष्ट दिखाई दे रहे हैं। Indian Express की पड़ताल में दो चुनाव आयुक्तों की ओर से दर्ज की गई आपत्तियों और उनसे जुड़े दस्तावेजों का हवाला दिया गया है, जबकि निर्वाचन आयोग का कहना है कि ऐसी टिप्पणियां निर्णय प्रक्रिया का सामान्य हिस्सा हैं और अंतिम निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए।
इस विवाद के बीच SIR को लेकर पहले से चल रही राजनीतिक और कानूनी बहस और तेज हो गई है। अब ध्यान इस बात पर है कि आयोग इन आपत्तियों से जुड़े विशिष्ट सवालों पर आगे क्या स्पष्टीकरण देता है और अदालतों के समक्ष SIR की प्रक्रिया को लेकर क्या रुख सामने आता है।














