बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर के कुलपति प्रो. (डॉ.) सचिदानंद शुक्ला की नियुक्ति को चुनौती देने वाली जनहित याचिका खारिज कर दी है। कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता यह साबित नहीं कर सके कि नियुक्ति से व्यापक जनहित प्रभावित हुआ है या आम जनता को कोई नुकसान पहुंचा है।
मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने मामले की सुनवाई की।
किन लोगों ने दायर की थी याचिका?
यह जनहित याचिका डॉ. राकेश गुप्ता और प्रो. लक्ष्मी शंकर निगम ने दायर की थी। दोनों ने 13 अप्रैल 2023 को प्रो. (डॉ.) सचिदानंद शुक्ला के पक्ष में जारी कुलपति नियुक्ति आदेश को चुनौती दी थी।
याचिकाकर्ताओं का मुख्य तर्क था कि कुलपति पद पर नियुक्ति के लिए यूजीसी रेगुलेशन 2018 के रेगुलेशन 7.3 के तहत आवश्यक 10 वर्ष के प्रोफेसर अनुभव की पात्रता पूरी नहीं होती थी। इसके अलावा उन्होंने कुलपति के चयन के लिए गठित सर्च कमेटी की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए थे।
सरकार ने उठाया था जनहित याचिका की वैधता पर सवाल
राज्य सरकार और अन्य प्रतिवादियों ने शुरुआत में ही याचिका की सुनवाई योग्य होने पर आपत्ति जताई। उनका कहना था कि याचिका में आम जनता को हुए किसी वास्तविक नुकसान का उल्लेख नहीं है। मामला मूल रूप से एक व्यक्ति की नियुक्ति से जुड़ा है, इसलिए इसे जनहित याचिका के रूप में चुनौती देने का आधार नहीं बनता।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला
हाईकोर्ट ने Gurpal Singh बनाम State of Punjab मामले में सुप्रीम कोर्ट के 2005 के फैसले का उल्लेख किया। अदालत ने कहा कि जनहित याचिका पर विचार करने से पहले याचिकाकर्ता की विश्वसनीयता, प्रस्तुत तथ्यों की प्रथमदृष्टया सत्यता और मामले की गंभीरता को देखना आवश्यक है।
अदालत ने यह भी कहा कि PIL का इस्तेमाल किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने या सरकार के निर्णय पर दुर्भावनापूर्ण हमला करने के लिए नहीं किया जाना चाहिए।
अन्य कानूनी रास्ते खुले
हाईकोर्ट ने कहा कि मौजूदा मामले में याचिकाकर्ता यह साबित नहीं कर पाए कि उन्होंने वास्तविक और व्यापक जनहित में याचिका दायर की है। इसलिए PIL खारिज की जाती है।
हालांकि अदालत ने याचिकाकर्ताओं को अन्य प्रभावी कानूनी उपाय अपनाने की स्वतंत्रता दी है। यानी कुलपति की नियुक्ति को लेकर उनके पास कानून के तहत उपलब्ध दूसरे रास्ते खुले रहेंगे।













