जयंती के मौके पर प्रलेस, इप्टा और जलेस ने किया स्मरण
बिलासपुर। भारतीय समाज की संवेदनाओं, संघर्षों और नैतिक मूल्यों को साहित्य से जोड़ने वाले महान कथाकार मुंशी प्रेमचंद आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं, जितने अपने समय में थे। उनकी रचनाएं केवल साहित्य नहीं, बल्कि समाज को सत्य और न्याय का मार्ग दिखाने वाली अमूल्य धरोहर हैं। यह बात प्रो. पी.डी. महंत ने प्रेमचंद जयंती पर आयोजित समारोह में कही।
प्रगतिशील लेखक संघ, बिलासपुर इकाई द्वारा इप्टा और जलेस के सहयोग से डी.पी. चौबे स्मृति प्रेस क्लब ट्रस्ट भवन में आयोजित कार्यक्रम में प्रो. महंत मुख्य वक्ता के रूप में शामिल हुए। उन्होंने कहा कि प्रेमचंद ने अपने साहित्य के माध्यम से हमेशा सच का साथ देने और नैतिक मूल्यों पर अडिग रहने का संदेश दिया। उनकी रचनाओं का मूल स्वर मानवीय संवेदना है, जो आज भी समाज को दिशा देता है।
‘गोदान’ और अन्य रचनाओं की आज भी बनी हुई है प्रासंगिकता
प्रो. महंत ने प्रेमचंद के उपन्यास ‘गोदान’ सहित कई रचनाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि बदलते समय में उन्हें नए दृष्टिकोण से पढ़ने और समझने की आवश्यकता है। उनके साहित्य में भारतीय समाज की वास्तविक तस्वीर दिखाई देती है, जो आज भी उतनी ही सजीव और सार्थक है।
कार्यक्रम की शुरुआत अरुण दाभड़कर द्वारा प्रेमचंद की प्रसिद्ध कहानी ‘पंच परमेश्वर’ के पाठ से हुई।
प्रेमचंद के साहित्य में समाज का जीवंत चित्रण
परिचय वक्तव्य में रफीक खान ने कहा कि प्रेमचंद गहरी मानवीय संवेदना के कथाकार थे। उन्होंने अपने समय की सामाजिक परिस्थितियों को निकट से देखा और उन्हें अत्यंत यथार्थवादी ढंग से अपनी कहानियों में प्रस्तुत किया। यही कारण है कि उनकी रचनाएं आज भी पाठकों से सीधा संवाद करती हैं।
नथमल शर्मा ने प्रेमचंद द्वारा साहित्यकार जयशंकर प्रसाद को लिखे गए एक पत्र का वाचन करते हुए कहा कि प्रेमचंद केवल अपने समय की नहीं, बल्कि भविष्य की भी चिंता करने वाले लेखक थे। उन्होंने प्रेमचंद के पत्रकारिता पक्ष का उल्लेख करते हुए बताया कि कठिन परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने पत्रिका ‘हंस’ का प्रकाशन पूरी प्रतिबद्धता के साथ जारी रखा।
‘पंच परमेश्वर’ से लेकर बाल पात्रों तक हुई चर्चा
प्रो. मुरली मनोहर सिंह ने ‘पंच परमेश्वर’ की वैचारिक पृष्ठभूमि पर प्रकाश डालते हुए कहा कि प्रेमचंद ने किसान जीवन के संघर्षों और भारतीय समाज के अंतर्विरोधों को अपनी रचनाओं में प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया। उन्होंने ‘ईदगाह’ के हमीद जैसे बाल पात्रों का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रेमचंद के बाल चरित्र भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं, जितने उनके अन्य पात्र।
भारतीय समाज की गहरी समझ थी प्रेमचंद में
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे कपूर वासनिक ने प्रेमचंद के जीवन और साहित्य से जुड़े अनेक प्रसंग साझा किए। उन्होंने समकालीन साहित्यकारों से उनके संबंधों और ‘बड़े भाई साहब’ जैसी चर्चित कहानियों का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रेमचंद ने भारतीय समाज को गहराई से समझा और उसे अपनी रचनाओं में अत्यंत प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया।
कार्यक्रम में प्रो. आर.के. सक्सेना, हबीब खान, रामकुमार तिवारी, नरेश अग्रवाल, संजय चंदेल, नमिता घोष, डॉ. ऋतु रानी, रुद्र अवस्थी, गोपालचंद्र मुखर्जी, द्वारिका प्रसाद अग्रवाल, प्रथमेश मिश्रा, आशुतोष त्रिवेदी, मोबीन अहमद, सिद्धांत दुबे, सुदेश दुबे ‘साथी’, वी. मेहर प्रसाद, अमित कुमार चौबे, राजेश कुमार, आकृति सिंह, अफसाना खातून, मानस, अक्षत, मिर्जा अजीज बेग और धर्मेंद्र निर्मलकर सहित अनेक साहित्यप्रेमी उपस्थित रहे।
कार्यक्रम का संचालन सचिन शर्मा ने किया, जबकि डॉ. सत्यभामा अवस्थी ने आभार व्यक्त किया।













