मुजफ्फरनगर, (उत्तरप्रदेश)। यहां की फास्ट ट्रैक कोर्ट नंबर-3 के अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश रवि कुमार दिवाकर पिछले कुछ महीनों से लगातार चर्चा में हैं। अप्रैल 2026 से अब तक उन्होंने करीब 11 मामलों में 23 दोषियों को मौत की सजा सुनाई है।

7 सितंबर 2026 को दिए गए उनके ताजा फैसले ने इस चर्चा को और तेज कर दिया है। इसमें उन्होंने न सिर्फ एक हत्या के आरोपी को फांसी की सजा दी, बल्कि अपने फैसले में गैंगस्टरों की धमकी, मामलों की वापसी और सुरक्षा संबंधी आरोपों का भी जिक्र किया।

दहेज हत्या मामले में मौत की सजा

7 सितंबर को जज दिवाकर ने नदीम नाम के व्यक्ति को उसकी पत्नी शहजादी की हत्या के मामले में मौत की सजा सुनाई। शाहजादी 23 साल की थीं। जुलाई 2018 में नदीम ने उन पर केरोसिन डालकर आग लगा दी थी। शाहजादी को दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल ले जाया गया, जहां उनकी मौत हो गई। मरने से पहले दिए गए बयान में उन्होंने पति पर आरोप लगाया था।

अदालत ने इस मामले को ‘रैरेस्ट ऑफ रेयर’ श्रेणी में माना। शहजादी के माता-पिता सहित अन्य गवाहों के पक्ष बदलने के बावजूद मरने वाले व्यक्ति के बयान के आधार पर दोष सिद्ध माना गया। नदीम पर एक लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया गया। यह सजा उच्च न्यायालय की पुष्टि के बाद ही लागू हो सकती है।

फैसले में गैंगस्टरों और माफिया का जिक्र

38 पन्नों के इस फैसले में जज दिवाकर ने अदालती मामलों से आगे बढ़कर कई बातें कही। उन्होंने लिखा कि हालिया घटनाक्रम से वे बहुत आहत और दुखी हैं। पिछले महीने उनके कोर्ट से करीब 97 हत्या और गंभीर अपराधों के मामले वापस ले लिए गए थे। जिला एवं सत्र न्यायाधीश बीरेंद्र कुमार सिंह के आदेश पर ये फाइलें उनकी अदालत से हटाई गईं।

जज ने कहा कि उन्हें पता है कि ऐसा क्यों हुआ, लेकिन पद की मर्यादा का ध्यान रखते हुए वे अभी सब कुछ नहीं बता सकते। उनके मुताबिक, इन मामलों को हटाने का मकसद माफिया, गैंगस्टर और अपराधियों को संरक्षण देना था। फाइलें हटने के बाद पश्चिमी उत्तर प्रदेश के एक गैंगस्टर ने बिचौलिये के जरिए उन्हें संदेश भिजवाया। संदेश में कहा गया कि अभी सिर्फ फाइलें हटाई गई हैं। अगर आप हमारे पीछे पड़ेंगे या कोई टिप्पणी करेंगे तो प्रभाव डालकर अदालत बदलवा देंगे या जिले से बाहर ट्रांसफर करवा देंगे।

इस पर जज दिवाकर ने लिखा, “मैं कायर जज कहलाने से बेहतर मौत को प्राथमिकता दूंगा।” उन्होंने कहा कि उनके माता-पिता ने उन्हें सिर्फ भगवान से डरना सिखाया है। अगर वे माफिया या अपराधियों से डर गए तो जनता का न्यायपालिका पर भरोसा टूट जाएगा। वे अपने सिद्धांतों पर अडिग रहकर सेवा करते रहेंगे, वरना इस्तीफा दे देंगे।

सुरक्षा को लेकर भी उठे सवाल

जज दिवाकर ने सुरक्षा व्यवस्था में कटौती का भी आरोप लगाया। उन्होंने डीजीपी को पत्र लिखकर बताया था कि उनकी सुरक्षा में तैनात गनर को बिना वजह और बिना सहमति के हटा दिया गया। पुलिस का कहना है कि गनर छुट्टी पर थे और विकल्प के रूप में दूसरे जवान तैनात किए गए थे। बाद में पुराने गनर को फिर से ड्यूटी पर लगा दिया गया।

जज ने ज्ञानवापी मामले का भी जिक्र किया। 2022 में वाराणसी में सिविल जज रहते हुए उन्होंने ज्ञानवापी मस्जिद परिसर के वीडियोग्राफिक सर्वे का आदेश दिया था। उसके बाद उन्हें और उनके परिवार को कई धमकियां मिली थीं, जिनमें अंतरराष्ट्रीय नंबरों से आने वाले कॉल भी शामिल थे। एक आईएसआईएस से जुड़े आतंकी ने उनके फोटो पर ‘काफिर’ लिखकर इंस्टाग्राम पर पोस्ट किया था।

जज रवि कुमार दिवाकर कौन हैं?

रवि कुमार दिवाकर का जन्म जुलाई 1980 में हुआ। 2009 में उन्होंने सिविल जज के रूप में न्यायिक सेवा शुरू की। सुल्तानपुर, बदायूं, वाराणसी, बरेली और अब मुजफ्फरनगर में वे तैनात रहे हैं। नवंबर 2025 से मुजफ्फरनगर की फास्ट ट्रैक कोर्ट में काम कर रहे हैं। बरेली में तैनाती के दौरान उन्होंने 13 दोषियों को मौत की सजा दी थी। मुजफ्फरनगर में 22 और जोड़कर कुल 35 मौत की सजाएं उनके खाते में हैं।

उनके फैसले तेज रफ्तार से आने के कारण न्यायिक हलकों में चर्चा हुई। कुछ वकील और पक्षकारों में इस बात की आशंका जताई गई कि उनकी अदालत में मौत की सजा मिलने की संभावना ज्यादा है। इसी के बाद मामलों को वापस लिया गया।

माफिया और अपराध नियंत्रण पर टिप्पणी

फैसले में जज दिवाकर ने मुजफ्फरनगर को लेकर भी बात कही। उन्होंने माना कि पहले जिले को अपराध की राजधानी कहा जाता था। संगठित गिरोह, फिरौती के लिए अपहरण, हत्या और राजनीतिक संरक्षण की चर्चा आम थी। सरकार की सख्त नीति-एनकाउंटर, संपत्ति जब्ती और एनएसए के इस्तेमाल-से अपराध कम हुआ है। यह बात उन्होंने सरकारी वकील की दलील से सहमति जताते हुए कही।

पश्चिम यूपी में माफिया और जजों की सुरक्षा का मुद्दा उभरा 

जज दिवाकर के फैसले और बयानों ने न्यायपालिका, सुरक्षा और प्रशासनिक फैसलों पर नई बहस छेड़ दी है। एक तरफ पीड़ित परिवारों को सख्त सजा मिलने से राहत का भाव है, दूसरी तरफ मौत की सजाओं की संख्या और मामलों की वापसी को लेकर सवाल भी उठ रहे हैं। उच्च न्यायालय में इन सजाओं की पुष्टि का इंतजार है।

यह मामला सिर्फ एक जज के फैसले तक सीमित नहीं है। यह न्यायपालिका की स्वतंत्रता, सुरक्षा व्यवस्था और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में माफिया प्रभाव जैसे बड़े मुद्दों से जुड़ा हुआ है।

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