22 साल पुराने मामले में सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक निर्णय, कहा-“देह व्यापार के लिए तस्करी संविधान की गरिमा पर सीधा हमला”

नई दिल्ली देश में मानव तस्करी और व्यावसायिक यौन शोषण (Commercial Sexual Exploitation-CSE) के खिलाफ लड़ाई को मजबूत करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने केंद्र और राज्यों को निर्देश दिया है कि तस्करी की शिकार महिलाओं और बच्चियों की पहचान, बचाव, सुरक्षा, पुनर्वास और न्याय सुनिश्चित करने के लिए पूरे देश में एक समान “विक्टिम प्रोटेक्शन प्रोटोकॉल” लागू किया जाए।

न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और आर. महादेवन की पीठ ने कहा कि देह व्यापार के लिए मानव तस्करी केवल एक आपराधिक कृत्य नहीं, बल्कि संविधान द्वारा प्रदत्त मानवीय गरिमा और मौलिक अधिकारों पर सीधा आघात है। अदालत ने इस मामले को “दिल के बेहद करीब” बताते हुए कहा कि यह फैसला हजारों असुरक्षित महिलाओं और बच्चियों के जीवन को प्रभावित करेगा।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में एक व्यापक “विक्टिम प्रोटेक्शन प्लान” प्रस्तुत किया है, जिसमें बचाव अभियान (रेस्क्यू ऑपरेशन), पीड़ितों की पहचान, कानूनी सहायता, पुनर्वास, अभियोजन प्रक्रिया और विभिन्न सरकारी एजेंसियों के बीच समन्वय के लिए विस्तृत दिशा-निर्देश शामिल हैं।

यह मामला वर्ष 2004 में हैदराबाद स्थित गैर-सरकारी संगठन Prajwala द्वारा दायर याचिका से शुरू हुआ था। याचिका में आरोप लगाया गया था कि देह व्यापार के लिए तस्करी की गई लड़कियों और महिलाओं के संरक्षण, बचाव और पुनर्वास के लिए देश में पर्याप्त कानूनी और संस्थागत व्यवस्था नहीं है। विशेष रूप से यह मुद्दा उठाया गया था कि बचाव अभियान से पहले, दौरान और बाद में पीड़ितों के साथ अक्सर असंवेदनशील व्यवहार किया जाता है।

याचिका में कहा गया था कि देह व्यापार के लिए मानव तस्करी एक अत्यंत लाभकारी संगठित अपराध बन चुकी है, जिसे तस्करों के जटिल नेटवर्क संचालित करते हैं। समय के साथ तस्करी की शिकार होने वाली बच्चियों की उम्र लगातार कम होती गई है। नौकरी, ग्लैमर, विवाह या पारिवारिक संकट से मुक्ति जैसे झूठे वादों के जरिए उन्हें जाल में फंसाया जाता है।

सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि वयस्क व्यक्तियों की सहमति और उनकी स्वायत्तता का सम्मान किया जाना चाहिए। न्यायालय ने संकेत दिया कि मानव तस्करी और जबरन यौन शोषण को स्वेच्छा से किए जाने वाले वयस्क यौन कार्य (Voluntary Adult Sex Work) से अलग समझना जरूरी है, ताकि पीड़ितों के अधिकारों की रक्षा के साथ-साथ संवैधानिक स्वतंत्रता भी सुरक्षित रह सके।

फैसले के दौरान न्यायमूर्ति महादेवन ने वरिष्ठ अधिवक्ता Aparna Bhat की लंबे समय तक की गई पैरवी की सराहना करते हुए कहा कि इस मामले में उनके प्रयासों को इतिहास लंबे समय तक याद रखेगा। वहीं न्यायमूर्ति पारदीवाला ने कहा कि इस निर्णय को तैयार करने में लंबा समय लगा, लेकिन इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि भविष्य में इस विषय पर पीड़ितों के अधिकारों को लेकर स्पष्ट दिशा उपलब्ध रहे।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला भारत में मानव तस्करी के खिलाफ न्यायिक हस्तक्षेप के सबसे महत्वपूर्ण निर्णयों में से एक साबित हो सकता है। इससे न केवल बचाव और पुनर्वास की प्रक्रियाओं में सुधार होगा, बल्कि पुलिस, प्रशासन और कल्याणकारी संस्थाओं की जवाबदेही भी बढ़ेगी।

 

 

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