विशेष POCSO अदालत का फैसला, 54 दिनों में पूरा हुआ ट्रायल

चेन्नई। तमिलनाडु के चर्चित थूथुकुडी छात्रा दुष्कर्म एवं हत्या मामले में विशेष POCSO अदालत ने दोषी धर्मा मुनीश्वरन (38) को दो मामलों में मौत की सजा सुनाई है। अदालत ने वैज्ञानिक साक्ष्यों, डीएनए जांच और गवाहों के बयानों के आधार पर उसे 17 वर्षीय छात्रा के साथ दुष्कर्म और उसकी हत्या का दोषी पाया।

यह मामला मार्च 2026 में सामने आया था, जब थूथुकुडी जिले के वेदानाथम गांव की 17 वर्षीय छात्रा 10 मार्च की शाम अपने घर के पास से लापता हो गई थी। अगले दिन उसका शव झाड़ियों के बीच बरामद हुआ। पोस्टमार्टम और जांच में उसके साथ यौन उत्पीड़न के बाद हत्या किए जाने की पुष्टि हुई थी।

घटना ने पूरे तमिलनाडु में आक्रोश पैदा कर दिया था। पीड़िता के परिजनों और ग्रामीणों ने विरोध प्रदर्शन करते हुए आरोपी की गिरफ्तारी तथा पुलिस की कथित लापरवाही पर कार्रवाई की मांग की थी। मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस ने 10 विशेष जांच दल गठित किए थे।

सीसीटीवी और डीएनए ने खोला राज

जांच की शुरुआत में पुलिस के पास कोई प्रत्यक्ष सुराग नहीं था। इसे “ब्लाइंड केस” माना जा रहा था। हालांकि, सीसीटीवी फुटेज के विश्लेषण के दौरान एक दोपहिया वाहन चालक संदिग्ध के रूप में सामने आया। इसके बाद वैज्ञानिक जांच और फोरेंसिक साक्ष्यों के आधार पर धर्मा मुनीश्वरन तक पुलिस पहुंची।

करीब एक सप्ताह तक चले अभियान के बाद आरोपी को 19 मार्च को गिरफ्तार किया गया। डीएनए नमूनों के मिलान ने उसकी संलिप्तता को निर्णायक रूप से साबित कर दिया।

1,150 पन्नों की चार्जशीट, 71 गवाह

मामले की जांच कर रहे विलाथिकुलम के डीएसपी सुंदरपांडियन ने 31 मार्च को लगभग 1,150 पन्नों की चार्जशीट अदालत में दाखिल की। अभियोजन पक्ष ने सुनवाई के दौरान 71 गवाहों के बयान दर्ज कराए तथा 19 भौतिक और 117 दस्तावेजी साक्ष्य प्रस्तुत किए।

द्वितीय अतिरिक्त जिला न्यायाधीश एम. ब्रीथा की अदालत में 5 मई से 22 मई के बीच गवाहों की जिरह और सुनवाई पूरी हुई। अदालत ने भारतीय न्याय संहिता (BNS) की संबंधित धाराओं और POCSO अधिनियम की धारा 6 के तहत आरोपी को दोषी ठहराते हुए दो अलग-अलग आरोपों में दो बार मौत की सजा तथा एक वर्ष के कारावास का दंड सुनाया।

“न्याय व्यवस्था पर भरोसा मजबूत हुआ”

दक्षिण क्षेत्र के पुलिस महानिरीक्षक विजयेंद्र बिदारी ने फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि यह निर्णय आपराधिक न्याय प्रणाली में लोगों के विश्वास को मजबूत करता है। उन्होंने कहा कि बिना किसी शुरुआती सुराग वाले मामले को वैज्ञानिक जांच और साक्ष्यों के आधार पर सुलझाया गया तथा मात्र 54 दिनों में ट्रायल पूरा कर दोषी को कठोरतम सजा दिलाई गई।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला बालिकाओं के खिलाफ यौन अपराधों और जघन्य हिंसा के मामलों में त्वरित जांच और सुनवाई की दिशा में एक महत्वपूर्ण उदाहरण बन सकता है। हालांकि, मौत की सजा को लागू करने से पहले मामले की आगे की न्यायिक प्रक्रिया उच्च न्यायालय में भी पूरी की जाएगी।

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