224 GW क्षमता वाले संयंत्रों में सिर्फ 28.2 मिलियन टन कोयला, सामान्य जरूरत के मुकाबले आधे से भी कम भंडार
नई दिल्ली। देश में बिजली की बढ़ती मांग के बीच थर्मल पावर प्लांटों में कोयले का स्टॉक चिंता बढ़ाने वाला है। केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (CEA) के आंकड़ों के अनुसार, 2 सितंबर तक देश के 50 थर्मल पावर प्लांटों में कोयले का भंडार निर्धारित मानक के 50 प्रतिशत से भी कम रह गया था। इन संयंत्रों की कुल उत्पादन क्षमता करीब 224 गीगावाट है।
इन संयंत्रों के पास कुल 28.2 मिलियन टन (MT) कोयला उपलब्ध था, जबकि निर्धारित मानक के अनुसार करीब 58.7 MT का भंडार होना चाहिए। यानी उपलब्ध स्टॉक निर्धारित जरूरत का केवल 48 प्रतिशत है।
19 दिन की सामान्य जरूरत के मुकाबले करीब 9 दिन का स्टॉक
CEA के मानकों के मुताबिक 85 प्रतिशत प्लांट लोड फैक्टर पर इन संयंत्रों को प्रतिदिन करीब 3.1 MT कोयले की जरूरत मानी जाती है। हालांकि अधिकारियों के अनुसार वास्तविक दैनिक खपत करीब 2.4 MT है।
मौजूदा स्टॉक को 85 प्रतिशत प्लांट लोड फैक्टर के आधार पर देखें तो यह लगभग 9 दिनों की जरूरत के बराबर है। सामान्य तौर पर थर्मल पावर प्लांटों में करीब 19 दिनों का कोयला भंडार होना चाहिए। इस लिहाज से मौजूदा स्थिति सामान्य स्तर की तुलना में काफी नीचे है।
50 संयंत्रों में 45 घरेलू कोयले पर निर्भर
‘क्रिटिकल’ श्रेणी में शामिल 50 संयंत्रों में से 45 घरेलू कोयले पर आधारित हैं। चार संयंत्र आयातित कोयले के लिए डिजाइन किए गए हैं, जबकि एक संयंत्र वॉशरी रिजेक्ट पर चलता है।
मानकों के अनुसार जिन संयंत्रों में निर्धारित कोयला भंडार का 25 प्रतिशत से कम स्टॉक रह जाता है, उन्हें कम कोयला भंडार वाले संयंत्रों की श्रेणी में रखा जाता है।
हालांकि कोयला मंत्रालय के अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि ‘क्रिटिकल’ वर्गीकरण का अर्थ यह नहीं है कि संयंत्र में कोयले की आपूर्ति खत्म होने वाली है।
मंत्रालय बोला- रोजाना हो रही निगरानी
कोयला मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, थर्मल पावर प्लांट को क्रिटिकल श्रेणी में रखना CEA के निर्धारित मानकों के तहत नियमित निगरानी प्रक्रिया का हिस्सा है। इसका उद्देश्य ऐसे संयंत्रों पर अतिरिक्त नजर रखना और प्राथमिकता के आधार पर कार्रवाई करना है।
अधिकारियों के मुताबिक सभी 50 क्रिटिकल संयंत्रों की अंतर-मंत्रालयी टीम द्वारा रोजाना निगरानी की जा रही है। इन संयंत्रों को नियमित रूप से कोयले की आपूर्ति भी की जा रही है।
मानसून में हर साल प्रभावित होती है कोयले की आपूर्ति
कोयला आपूर्ति में कमी के पीछे मानसून को भी एक प्रमुख कारण माना जा रहा है। बारिश के दौरान खदानों से कोयला निकालने और उसकी ढुलाई में हर साल व्यवधान आता है। अधिकारियों का कहना है कि सितंबर से बारिश कमजोर पड़ने के साथ कोयले की आपूर्ति की स्थिति में सुधार शुरू होने की उम्मीद रहती है।
इस बीच बिजली उत्पादन की निरंतरता बनाए रखने के लिए कुछ कोयला आधारित बिजली संयंत्रों को अपनी निर्धारित रखरखाव गतिविधियों को टालने के लिए भी कहा गया है। इसका उद्देश्य उपलब्ध संयंत्रों से बिजली उत्पादन को निर्बाध बनाए रखना है।
फिलहाल सरकार की नजर, लेकिन स्टॉक घटने से बढ़ी चिंता
कोयले का मौजूदा भंडार तत्काल बिजली संकट का संकेत नहीं माना जा रहा है, क्योंकि सरकार का दावा है कि क्रिटिकल संयंत्रों को प्राथमिकता के आधार पर ईंधन उपलब्ध कराया जा रहा है। फिर भी निर्धारित 19 दिनों के सामान्य स्टॉक के मुकाबले करीब 9 दिनों का उपलब्ध भंडार बिजली की मांग और मानसून के बीच आपूर्ति व्यवस्था के लिए चुनौती जरूर बना हुआ है।
सितंबर में बारिश कम होने और कोयले की आपूर्ति सामान्य होने के साथ स्टॉक में सुधार की उम्मीद है। फिलहाल बिजली उत्पादन की निरंतरता बनाए रखने के लिए कोयला मंत्रालय और संबंधित एजेंसियां इन संयंत्रों की स्थिति पर लगातार नजर रख रही हैं।














