आरोपों की मेरिट पर फैसला नहीं
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ में वर्ष 2018-19 से 2020-21 के बीच धान खरीदी में कथित ₹415.70 करोड़ से अधिक की वित्तीय अनियमितता से जुड़ी दो जनहित याचिकाओं को हाईकोर्ट ने निष्प्रभावी मानते हुए निराकृत कर दिया है।
3 सितंबर को चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने दोनों याचिकाओं की संयुक्त सुनवाई की। इनमें एक याचिका ममता शर्मा की थी, जबकि दूसरी तत्कालीन/वर्तमान सार्वजनिक जीवन से जुड़े विधायक-अधिकारियों अजय चंद्राकर, बृजमोहन अग्रवाल, शिवरतन शर्मा और नारायण चंदेल की ओर से दायर की गई थी।
याचिकाओं में धान खरीदी व्यवस्था में स्टॉक और रिकॉर्ड में कथित हेरफेर, सरकारी खजाने को नुकसान, जिम्मेदार लोगों की व्यक्तिगत जवाबदेही तय करने और स्वतंत्र उच्चस्तरीय एजेंसी से जांच कराने की मांग की गई थी।
तीन साल में 2.23 लाख मीट्रिक टन धान का उल्लेख
याचिकाओं में 2018-19 में 3,067 मीट्रिक टन धान की करीब ₹5.38 करोड़ की कीमत, 2019-20 में 43,656 मीट्रिक टन की करीब ₹79.54 करोड़ कीमत और 2020-21 में 1,76,416 मीट्रिक टन धान की करीब ₹330.78 करोड़ कीमत का उल्लेख किया गया था। तीन वर्षों में कुल 2,23,139 मीट्रिक टन धान और करीब ₹415.70 करोड़ के कथित नुकसान का मुद्दा उठाया गया।
आरोप सही या गलत होने पर फैसला नहीं
सुनवाई के दौरान राज्य की ओर से अधिवक्ता अभिषेक चंद्र गुप्ता ने बताया कि बाद के वर्षों में सरकार ने नई धान खरीदी नीति लागू कर दी है। ऐसे में वर्तमान याचिकाओं में मांगी गई राहत प्रभावी रूप से प्रदान नहीं की जा सकती।
हाईकोर्ट ने इसी आधार पर दोनों याचिकाओं को infructuous मानकर निराकृत कर दिया। अदालत ने कथित ₹415.70 करोड़ की अनियमितता के आरोपों की मेरिट पर कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं दिया। इसलिए आदेश को आरोपों पर किसी तरह की ‘क्लीन चिट’ के रूप में नहीं देखा जा सकता।














