कहा- NIA की चार्जशीट में 200 से अधिक नक्सलियों की संलिप्तता, फिर बाकी तक क्यों नहीं पहुंची जांच?
2020 की FIR की जांच का रास्ता सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया, फिर भी आगे कार्रवाई नहीं हुई : श्रीवास्तव
बिलासपुर। झीरम घाटी नक्सली हमले के मामले में जगदलपुर की एनआईए अदालत द्वारा 10 आरोपियों को दोषी ठहराए जाने के बाद कांग्रेस और पीड़ित परिवारों की ओर से मामले की जांच को लेकर एक बार फिर सवाल उठाए गए हैं।
कांग्रेस और झीरम मामले के पीड़ित परिवारों का प्रतिनिधित्व कर रहे अधिवक्ता सुदीप श्रीवास्तव ने कहा कि केवल 10 निचले स्तर के नक्सलियों को सजा मिलना झीरम मामले में न्याय नहीं माना जा सकता। उनके मुताबिक इस मामले की वास्तविक सच्चाई सामने आने के लिए हमले के पीछे कथित बड़ी साजिश की भी जांच जरूरी है।
श्रीवास्तव ने जारी बयान में कहा कि एनआईए की चार्जशीट में ही 200 से अधिक नक्सलियों की संलिप्तता का उल्लेख किया गया था और 39 लोगों के नाम सामने आए थे। ऐसे में केवल 10 आरोपियों को दोषी ठहराए जाने से मामले के सभी पहलुओं का समाधान नहीं होता। उन्होंने आरोप लगाया कि एनआईए ने शेष आरोपियों को पकड़ने के लिए गंभीर प्रयास नहीं किए।
‘राजनीतिक साजिश के पहलू की जांच नहीं हुई’
अधिवक्ता ने कहा कि झीरम हमले के बाद से ही पीड़ित परिवार यह मांग करते रहे हैं कि घटना के पीछे किसी बड़ी राजनीतिक साजिश की भूमिका की भी जांच की जाए। उनका दावा है कि इस पहलू पर एनआईए ने कोई प्रभावी जांच नहीं की।
श्रीवास्तव के मुताबिक, छत्तीसगढ़ पुलिस ने जीतेंद्र मुदलियार की शिकायत के आधार पर वर्ष 2020 में एक नई FIR दर्ज की थी। इस FIR की जांच को लेकर एनआईए ने अदालत का रुख किया और मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा। उन्होंने कहा कि नवंबर 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने एनआईए की अपील खारिज कर दी, जिससे इस FIR की जांच का रास्ता साफ हो गया था।
उन्होंने सवाल उठाया कि इसके बावजूद पिछले करीब ढाई वर्षों में इस मामले में कोई प्रभावी जांच क्यों नहीं हुई। उनका आरोप है कि दिसंबर 2023 में राज्य में भाजपा सरकार के दोबारा सत्ता में आने के बाद भी इस दिशा में कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।
जांच आयोग को लेकर भी उठाए सवाल
श्रीवास्तव ने झीरम घाटी की न्यायिक जांच को लेकर भी अपना पक्ष रखा। उन्होंने कहा कि न्यायमूर्ति प्रशांत मिश्रा की अध्यक्षता वाले जांच आयोग का मुख्य फोकस सुरक्षा में हुई चूक और अन्य परिस्थितियों की जांच पर था। उनके अनुसार, जब आयोग ने अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की तो राज्य सरकार ने उसे अधूरा माना और आगे की जांच के लिए न्यायमूर्ति मिन्हाजुद्दीन तथा न्यायमूर्ति सतीश अग्निहोत्री की अध्यक्षता में नया आयोग गठित किया।
अधिवक्ता ने कहा कि तत्कालीन भाजपा प्रदेश अध्यक्ष और वर्तमान विधायक धरमलाल कौशिक ने इस नए जांच आयोग के गठन को हाईकोर्ट में चुनौती दी। इसके बाद हाईकोर्ट ने आयोग की कार्यवाही पर रोक लगा दी, जो अब तक जारी है।
‘जांच रोकने की कोशिश क्यों?’
श्रीवास्तव ने कहा कि झीरम घाटी मामले में पीड़ित परिवार लंबे समय से यह जानना चाहते हैं कि हमले की पूरी साजिश क्या थी, इसके पीछे कौन लोग थे और हमले की योजना किस स्तर पर बनाई गई थी।
उन्होंने सवाल उठाया कि यदि सरकार और जांच एजेंसियां मामले की पूरी सच्चाई सामने लाना चाहती हैं, तो जांच के अलग-अलग रास्तों को रोकने की कोशिश क्यों की जा रही है? उन्होंने NIA और भाजपा नेताओं से यह स्पष्ट करने की मांग की कि झीरम मामले से जुड़ी किसी भी नई जांच या जांच आयोग की कार्यवाही को आगे बढ़ने से रोकने के प्रयास क्यों किए जा रहे हैं।
‘दोषियों को सजा के साथ पूरी साजिश का खुलासा भी जरूरी’
श्रीवास्तव ने कहा कि झीरम घाटी हमला केवल कुछ लोगों की हत्या का मामला नहीं है, बल्कि इसमें छत्तीसगढ़ के राजनीतिक और सुरक्षा इतिहास की एक बेहद गंभीर घटना जुड़ी हुई है। इसलिए न्याय का उद्देश्य केवल कुछ आरोपियों को सजा दिलाना नहीं, बल्कि घटना के पीछे की पूरी सच्चाई सामने लाना भी होना चाहिए।
उन्होंने कहा कि पीड़ित परिवारों की न्याय की लड़ाई अभी समाप्त नहीं हुई है। उनका जोर इस बात पर है कि हमले में शामिल सभी लोगों और कथित साजिश की निष्पक्ष जांच हो तथा दोषियों की पहचान कर उन्हें कानून के दायरे में लाया जाए।














